NTA यू.जी.सी. नेट जेआरएफ परीक्षा, जून-2023 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY)

Total Questions: 100

21. जीवन केन्द्रिकवाद (बायोसोन्ड्रिज्म) समर्थन करता है कि:

Correct Answer: (c) जीवन के सभी स्वरूपों को नैतिक अनुचिंतन आवश्यकता होती है
Solution:

जीवन केन्द्रिकवाद (बायोसोन्ड्रिज्म) समर्थन करता है कि जीवन के सभी स्वरूपों को नैतिक अनुचिंतन की आवश्यकता होती है।
* बायोसेंट्रिज्म शब्द में सभी पर्यावरणीय नैतिकताएँ शामिल हैं। जो मानव से प्रकृति में सभी जीवित चीजों तक नैतिक वस्तु की स्थिति का विस्तार करती है।
* बायोसेंट्रिक नैतिकता मनुष्य और प्रकृति के बीच सम्बधों पर पुनर्विचार करने का आहवाहन करती है। सभी जीवित चींजों की एक समान नैतिक स्थिति होती है और समान नैतिक विचार के लायक होते है।
* जैवकेन्द्रीयता- एक नैतिक दृष्टिकोण है जो मानता है कि सभी जीवित वस्तुओं को मान मिलना चाहिए। वास्तव में यह मानवकेंद्रीयता का विरोधी विचार है।

22. "नैसर्गिक अधिकार बलवान का अधिकार है, अपने स्वयं के हितों की रक्षा के लिए शक्तिशाली एवं विशेषाधिकार प्राप्त कुछ लोगों द्वारा नियम बनाये गये हैं।" यह किसका मत है?

Correct Answer: (c) सोफिस्ट
Solution:

"नैसर्गिक अधिकार बलवान अधिकार है, अपने स्वयं के हितों की रक्षा के लिए शक्तिशाली एवं विशेषाधिकार प्राप्त कुछ लोगों द्वारा नियम बनाये गये हैं।” यह मत सोफिस्ट का है।
* मानवीयता पर बल देने के कारण सुकरात को सर्वश्रेष्ठ सोफिस्ट कहा जाता है। इस विचार में भी वह सोफिष्ट था कि वह समाज के रीति रिवाजों और कानूनों कि परवाह न करते हुए व्यक्ति को विचार की स्वतंत्रता का अधिकार देने का प्रबल पक्षपाती था।
* सोफिस्ट विचार धारा: कानून एवं विधियों का जन्म, प्रकृतिजन्य न मानकर, राजा की सत्ता के स्वरूप मानते थे। जिसके कारण व्यक्ति अपनी स्वभाविक प्रकृति से कार्य न कर अपनी बुद्धि और चेतना के विरूद्ध, कानून के अनुरूप कार्य करता है।

23. सूची I का सूची II से मिलान कीजिए

LIST I (नियम)LIST II (तर्क रूप)
A(अवशोषण)I. P ⊃ q, ~ q ∴ ~p
B(सरलीकरण)II. P, q ∴ P.q
C(संयोजन)III. P . q ∴ P
D(निषेधक हेतु फलानुमान)IV. P ⊃ q, ∴ p ⊃ (p.q)

निम्नलिखित विकल्पों में से सही उत्तर का चयन कीजिए :

Correct Answer: (c) A-IV, B-III, C-II, D-I
Solution:

24. "प्रत्यय सतत् शिथिल अथवा संयोग से नहीं जुड़े हैं, बल्कि स्वयं को एक दूसरे के साथ पद्धति और नियमितता की निश्चित मात्रा से समाविष्ट करते है" यह किस दार्शनिक द्वारा स्वीकार्य है

Correct Answer: (d) ह्यूम
Solution:

"प्रत्यय सत्त, शिथिल अथवा संयोग से नहीं जुड़े है, बल्कि स्वयं को एक दुसरे के साथ पद्धति और नियमितता की निश्चित मात्रा से समाविष्ट करते है"। यह ह्यूम दार्शनिक द्वारा स्वीकार किया गया है।
* ह्यूम का अर्थ, स्कॉटिश दार्शनिक जिनके संशयवादी दर्शन ने मानव ज्ञान को उस तक सीमित कर दिया। जिसे इंद्रियों द्वारा समझा जा सकता हैं।
* ह्यूम के अनुसार ऐसे बाह्य जगत में विश्वास करने का भी कोई औचित्य नहीं है। हमें तो सिर्फ प्रत्यक्षानुभाव होते हैं। उनसे स्वतंत्र या उनको उत्पन्न करने वाले बाह्य पदार्थों का हमें कभी अनुभव नहीं होता। बाह्य वस्तुओं में विश्वास भी आत्मा के अस्तित्व में विश्वास की तरह कल्पना की उपज है।

25. सूची I का सूची II से मिलान कीजिए

(सूची–I)(सूची–II)
A(सत्व)(सक्रिय)
B(रजस)(निष्क्रिय)
C(तमस)(हल्का एवं चमकीला)
D(पुरुष)(भारी एवं गहरा)

निम्नलिखित विकल्पों में से सही उत्तर का चयन कीजिए :

Correct Answer: (b) A-III, B-I, C-IV, D-II
Solution:

* सत्व गुण हल्कापन एवं चमकीला देता है।
* रज गुण गति या सक्रियता देता है।
* तम गुण मोह व आलस्य या भारी एवं गहरा देता है।
* पुरूष निष्क्रिय होता है।
* सत्व गुण हमारे मन में सकारात्मक विचार के प्रतीक है।
* सांख्य दर्शन में सात्व, रजस् और तमस् ये तीन गुण बताये गये हैं।

26. किसी कथन को आपतिक के रूप में विचार किया जाता है जब :

Correct Answer: (c) कभी-कभी सत्य और कभी-कभी असत्य
Solution:

किसी कथन को आपतिक के रूप में विचार किया जाता है। जब कभी-कभी सत्य और कभी-कभी असत्य होता है।
आकस्मिकवाद - दार्शनिक मत घटनाओं के अकारण घटित होने का सिद्धांत । यूनान के महान संचालन में अनके आकस्मिक संयोगों का विशेष महत्व हैं। अतः इस मत को आकस्मिकवाद कहा गया।

27. शंकर के विचार में, कौन-सा प्रमाण अन्तिम रूप में मान्य है?

Correct Answer: (d) शब्द
Solution:

आदि शंकर के विचार में 'शब्द' प्रमाण अन्तिम रूप में मान्य है। ये भारत के एक महान दार्शनिक एवं धर्मप्रवर्तक थे। उन्होने अद्वैत वेदान्त को ठोस आधार प्रदान किया।
* भारतीय दर्शन में प्रमाण उसे कहते हैं, जो सत्य ज्ञान करने में सहायता करे। अर्थात् वह बात जिससे किसी दूसरी बात का यथार्थ ज्ञान हो। प्रमाण न्याय का मुख्य विषय है। 'प्रमा' नाम है, यथार्थ ज्ञान का। यथार्थ ज्ञान का जो कारण हो अर्थात् जिसके द्वारा यथार्थ ज्ञान हो उसे प्रमाण कहत हैं। गौतम ने चार प्रमाण मानें हैं-
(1) प्रत्यक्ष (2) अनुमान (3) उपमान (4) शब्द ।

28. मार्ले पोन्टी की मूल खोज है :

Correct Answer: (b) शरीर-ज्ञाता
Solution:

मार्ले पोन्टी की मूल खोज शरीर-ज्ञाता है।
* मार्ले पोटी, फ्रांसीसी दार्शनिक और सार्वजनिक बुद्धिजीवी, युद्ध के फ्रांस में अस्तित्ववाद और घटना विज्ञान के अग्रणी अकादमिक प्रस्तावक थे।
* मार्ले-पोटी की स्थिति को भोले यथार्थवाद के रूप में गिना जाता है।
* शरीर-ज्ञाता- शरीर वस्तु से उनका तात्पर्य चिकित्सा विज्ञान द्वारा निर्धारित एवं पूर्वानुमानित शरीर से है। शरीर विषय से मार्ले-पोंटी का अभिप्राय उस शरीर से है जैसा कि हम इसका अनुभव करते है। यहाँ तक कि इसके बारे में जानने से पहले भी। यह हमारा पूर्व-प्रतिबिम्ब शरीर है, जो हमारे आस-पास की दुनिया को अर्थ देता है।

29. वैशेषिक दर्शन के द्वारा स्वीकार्य द्रव्यों की महत्ता पर विचार करते हुए सही ढंग से सुमेलित कूट का चयन कीजिए।

Correct Answer: (b) आकाश, काल और आत्मा
Solution:

वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक महर्षि कणाद है। उनकी कृति वैशेषिक सूत्र इस दर्शन का मूल प्रमाणिक ग्रन्थ है। वैशेषिक दर्शन यह प्रमेयों का विशेष विचार है। इस शास्त्र के अनुसार तत्वों का विचार करने में लौकिक दृष्टि से दूर भी शास्त्रकार जाते है। इनकी दृष्टि सूक्ष्म जगत् के द्वार तक जाती है। इसलिए इस शास्त्र में प्रमाण का विचार गौण समझा जाता है। वैशेषिक मत में सात पदार्थ हैं और 9 द्रव्य है।
* कोई भी गुण या कार्य बिना आधार के नहीं रह सकता। उनका कोई न कोई आधार अवश्यमेव होने चाहिए। यह आधार द्रव्य है। वैशेषिकों ने 9 द्रव्यों को मान्यता दी है- (1) पृथ्वी (2) जल (3) तेज/ अग्नि (4) वायु (5) आकाश (6) काल (7) दिक (8) आत्मा और (9) मन ।
यह स्वीकार द्रव्य क्रमानुसार है।
* आकाश → काल → आत्मा

30. निम्नलिखित न्याय वाक्य पर विचार कीजिए और इसके दोषों का पता लगाइए-

सभी मनुष्य मरणशील हैं।
सभी कवि मरणशील हैं।
सभी कवि मनुष्य है।

Correct Answer: (d) अव्याप्त मध्य पद
Solution:

न्याय किसी भी इनाम की उम्मीद नहीं करता है। वह खुद के लिए स्वीकार करती है। इसी तरह वे सभी गुण हैं।
* कोई विलक्षण घटना सूचित करने वाली उक्ति जो उपस्थित बात पर घटती हो 'न्याय' कहलाती है।
न्याय वाक्य: एक विशेष प्रकार का तर्क करने का तरीका है। जिसमें दो अन्य कथनों के आधार पर तीसरा कथन निकाला जाता है।
* आरस्तु ने न्यायवाक्य को इस प्रकार परिभाषित किया है- वह शास्त्रार्थ जिसमें कुछ चीजें (सत्य) मान लेने के बाद इनसे कुछ नया और भिन्न चीज व्युत्पन्न होती है। क्योंकि चीजें एसी ही हैं।
न्याय वाक्य के दोष :- यदि आधार वाक्यों में लघु पद अव्याप्त रहने पर निष्कर्ष में व्याप्त होता है, तो न्याय में अनुचित प्रक्रिया का दोष उत्पन्न हो जाता है।
* अव्याप्त मध्य पद न्यायवाक्य का दोष है।