Solution:न्यायदर्शन के प्रवर्तक ऋषि अक्षपाद गौतम है। जिनका न्याय सूत्र इस दर्शन का सबसे प्राचीन एवं प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसमें चार मुख्य प्रमाण है- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान एवं शब्द ।
* अनुमानः मणिमयःपर्वतो वहिमान धूमात, आश्रयासिद्ध हेत्वाभास को इंगित करता है।
* अनुमान प्रमाण से उन सभी पदार्थों का ज्ञान किया जाता है, जो इंद्रिय द्वारा ज्ञात होने की योग्यता रखते हुए भी दूरस्थ या अविद्यमान होने के कारण इंद्रिय से ज्ञात नहीं होते।
न्याय दर्शन के पाँच अवयव माने गये है- प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन ।
(1) पर्वतो वहिमान् ⇒ प्रतिज्ञा (2) धूमात् ⇒ हेतु (3) तथा चायम् ⇒ उपनय (4) यो यो धूमवान स स वहिमानं ⇒ उदाहरण (5)तस्माद् वहिमान् ⇒ निगमन ।
* इसी पंचवयवात्मक वाक्य को वात्स्यायन ने परम न्याय कहा है।
* हेत्वाभास- जिसके ज्ञान से अनुमिति उसके कारण भूत व्याप्तिज्ञान या पक्षधर्मताज्ञान का प्रतिबंध होता है। उसे हेतुगदोष के अर्थ में हेत्वाभास कहा जाता है।