मैं अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र के अभिप्राय का समर्थन करना चाहूँगा तथा इस समर्थन से इस स्वरूप के बारे में अनेक महत्वपूर्ण बिंदु उभर कर सामने आते है। इनमें से एक अनिवार्यतः अन्तः शास्त्रीयता है, क्योंकि इसमें जिन समस्याओं का उल्लेख होता है,
वे सामान्यतः जटिल व्यावहारिक समस्याएं होती हैं, जिनके साथ एक से अधिक प्रकार की विशेषज्ञता प्रासंगिक होती है। इसका तात्पर्य यह है कि आवश्यक विशेषज्ञता के इस युग में अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र को यदि समुचित विधि से प्रयुक्त करता है, तो इसे सहयोगात्मक उद्यम होना होगा। विशेषज्ञों के बीच इस प्रकार का सहयोग बिलकुल आसान नहीं है, और दार्शनिक प्रत्येक विशेषज्ञ द्वारा दूसरे विशेषज्ञ के समझ अपने शास्त्र के प्रतिपादन में से सहायता प्रदान कर स्वयं को उपयोगी बना सकता है।
अतः अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र के बारे में मेरे दूसरे बिंदु के लिए अन्य कारण यह है कि, इसमें अन्तर्दृष्टि, कल्पना और संश्लेषण के साथ-साथ विश्लेष्णात्मक विशेषज्ञता की भी आवश्यकता होती है। मेरा तीसरा बिंदु यह है कि सैद्धान्तिक तथा अनुप्रयुक्त दर्शन शास्त्र के बीच कोई सुनिश्चित विभाजन रेखा नहीं है- "अनुप्रयुक्त" समस्याओं से "सैद्धान्तिक" प्रश्न उत्पन्न होंगे (उदाहरणार्थ गर्भ निरोध पर प्रतिबंध से नैसर्गिक नियम की अवधारणा की न्यायसंगतता का प्रश्न उत्पन्न होता है), तथा "सैद्धान्तिक" दर्शन शास्त्र के सिद्धान्तों का अनुप्रयोग विशिष्ट समस्याओं (उदाहरणार्थ किसी सिद्धान्त के वैज्ञानिक होने के लिए परीक्षणीयता के मानदंड या प्रयोग मनोविश्लेषणात्मक तथा समाजशास्त्रीय अभिकथनों में किया जा सकता है।)
चौथा बिंदु यह है कि दूसरी तरफ भी जीवन की किसी समस्या के संबंध में अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र तथा सामान्य बुद्धि के अनुप्रयोग के बीच कोई सुनिश्चित विभाजन नहीं है ("प्रत्येक व्यक्ति का अपना अनुप्रयुक्त दार्शनिक होना") परंतु प्रत्येक व्यक्ति की सैद्धान्तिक दर्शनशास्त्र में रुचि नहीं होती है, और न ही इसके लिए वह समर्थ होता है; तथा सैद्धान्तिक दर्शनशास्त्र में प्रत्येक वस्तु के व्यापक आपादान नहीं होते हैं (उदाहरणार्थ मुझे संदेह है कि गणित के दर्शनशास्त्र के ऐसे कोई आपादान है।)
अतः हम अब यह देख सकते हैं कि यह सत्य है कि यद्यपि दर्शनशास्त्र के अपने विशिष्ट सरोकार हैं जो अनिवार्यतः व्यापक रुचि अथवा प्रासंगिकता के नहीं हैं (सैद्धान्तिक दर्शनशास्त्र की), तथापि यह भी सत्य है कि दर्शनशास्त्र “सामान्य जीवन के महत्वपूर्ण प्रश्नों" के लिए प्रासंगिक हो सकता है, और होना भी चाहिए।
अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र के स्वरूप के बारे में उठाये गये महत्वपूर्ण बिंदु है:
(A) यह स्वरूप में अंतः शास्त्रीय है।
(B) इसमें प्रतिपादन के बिना तथ्यों से जुड़े रहने की आवश्यकता होती है।
(C) सैद्धान्तिक तथा अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र में कोई सुनिश्चित विभाजन नहीं है।
(D) अनुप्रयुक्त सामान्य बुद्धि तथा अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र में कोई स्पष्ट विभाजन नहीं है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनेंः
Correct Answer: (c) केवल A, C और D
Solution:अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र में निम्नलिखित विशेषताएँ पाई जाती है-
1. इसका स्वरूप अंतशास्त्रीय होता है।
2. सैद्धान्तिक तथा अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र में कोई स्पष्ट विभाजन नहीं है।
3.अनुप्रयुक्त सामान्य बुद्धि तथा अनुप्रयुक्त दर्शन शास्त्र में कोई स्पष्ट विभाजन नहीं है।