NTA यू.जी.सी. नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर-2022 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY)

Total Questions: 100

91. निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए एवं दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

एक ओर वह विषय होता है जिससे हम अवगत होते हैं- यथा अपने मेज का वर्ण और दूसरी ओर स्वयं वास्तविक सचेतता, विषय के अवबोध की मानसिक क्रिया। मानसिक कर्म निस्संदेह मानसिक होता है, किन्तु क्या यह मानने का कोई कारण है कि अवबोधित विषय किसी अर्थ में मानसिक है? विषयों के संबंध में हमारे अवबोध के क्रम में कर्म और प्रयोजन के मध्य विभेद करने का यह प्रश्न अति महत्वपूर्ण है, क्योंकि हमारे ज्ञानार्जान की समग्र शक्ति इससे आबद्ध है। विषय के अतिरिक्त विषयों से सुपरिचित होने की ज्ञानशक्ति मनस की मुख्य अभिलाक्षणिक विशेषता है।
विषयों के ज्ञान में मूलतः मनस और मनस से भिन्न किसी अन्य तत्व के मध्य संबंध अंतर्निष्ट होता है: इसी से विषयों के ज्ञान हेतु मनस क्षमता का निर्माण होता है।
यदि यह कहा जाए कि बात विषय निपवादतः मनस में विद्यमान होना चाहिए तो या तो हम ज्ञान प्राप्त करने के संदर्भ में मनस की शक्ति को परिसीमित कर रहे हैं, या हम केवल पुररुक्ति का भाष्य कर रहे है। यदि हम 'मनस में' और 'मनस के समक्ष' दोनों का अभिप्राय एक समान मानते हैं,
अर्थात् यदि हमारा अभिप्राय केवल मनस द्वारा अवबोधित किए जाने के संदर्भ से हैं, तो हम केवल पुनरुक्ति का भाष्य कर रहे हैं। किन्तु यदि हमारा अभिप्राय यह है तो हमें स्वीकार करना होगा कि इस अर्थ में जो मनस में है वह मानसिक नहीं भी हो सकता है- यदि मैं किसी विषय में सुपरिचित हूँ जो अस्तित्व में है तो मेरा उस विषय से परिचित होने के फलस्वरूप मुझे यह ज्ञान प्राप्त होता है कि यह विषय विद्यमान है।
किन्तु विपर्यतः यह सत्य नहीं है कि जब कभी भी मुझे ज्ञान हो सकता है कि किसी प्रकार का कोई विषय अस्तित्व में है, मैं या कोई अन्य व्यक्ति उस विषय से अवश्य परिचित रहा होगा।
इस गद्यांश का पल्लवन निम्नांकित की प्रकृति के गवेषण के उद्देश्य से किया गया है-

Correct Answer: (c) कृत्य और ध्येय दोनों
Solution:

मानसिक कर्म निःसन्देह मानसिक होता है, किन्तु क्या यह मानने का कोई कारण है कि अवशोषित विषय किसी अर्थ में मानसिक है? विषयों के संबंध में हमारे अवबोध के क्रम में कर्म और प्रयोजन के मध्य विभेद करने का वह प्रश्न अति महत्वपूर्ण है। क्योंकि हमारे ज्ञानार्जन की समग्र शक्ति इसमें आबद्ध है। अतः स्पष्ट है कि उपरोक्त गद्यांश का पल्लवन कृत्य और ध्येय दोनों की प्रकृति के गवेषण के उद्देश्य से किया गया है।

92. दिए गए गद्यांश मे निम्नांकित में से किस दार्शनिक मत को अस्वीकृत किया गया है:

Correct Answer: (a) बर्कले
Solution:

प्रस्तुत गद्यांश में 'बर्कले' के मत को अस्वीकृत किया गया है।

93. कथन - 'ज्ञात वस्तुएं अनिवार्यतः मनस में होनी चाहिए', निम्नांकित में से किस दार्शनिक मत को सर्वाधिक निरूपित करता है:

Correct Answer: (b) व्यक्तिनिष्ठ आदर्शवाद
Solution:

'ज्ञात वस्तुएं अनिवार्यतः मनस में होनी चाहिए', यह व्यक्तिनिष्ठ आदर्शवाद का मत है। व्यक्तिनिष्ठ आदर्शवाद के अनुसार, 'मन और आत्माओं तथा उनकी धारणाओं या विचारों के अलावा कुछ भी मौजूद नहीं है। एक व्यक्ति भौतिक चीजों का अनुभव करता है। लेकिन उसका अस्तित्व अनुभव करने वाले मन से स्वतंत्र नहीं है। भौतिक चीजें इस प्रकार धारणाएँ मात्र है।

94. निम्नांकित कथन से किस दार्शनिक मत की विशेषता अभिव्यक्त होती है: "यह सत्य नहीं है कि जब कभी भी में यह जान सकता हूँ कि कतिपय प्रकार की कोई वस्तु अस्तित्व में है, मुझे अथवा किसी अन्य व्यक्ति को उन वस्तुओं से अवश्य परिचित होना चाहिए"

Correct Answer: (b) वास्तववाद
Solution:

"यह सत्य नहीं है कि जब कभी भी मैं यह जान सकता हूँ कि कतिपय प्रकार की कोई वस्तु अस्तित्व में है, मुझे अथवा किसी अन्य व्यक्ति को उन वस्तुओं से अवश्य परिचित होना चाहिए।" यह मत वास्तववाद से संबंधित है।
वास्तववाद विचारधारा उस वस्तु अथवा भौतिक जगत को सत्य मानती है। जिसका हम ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं।

95. दिए गए गद्यांश के अनुसार जब कोई व्यक्ति वस्तुओं कि प्रकृति के प्रत्यय का प्रयोग करता है तो निम्नांकित में से किन दो दार्शनिक दृष्टिकोण के मध्य विभेद की अनदेखी की जाती है:

Correct Answer: (d) सत्य का ज्ञान और वस्तुओं का ज्ञान
Solution:

यदि मैं किसी विषय में सुपरिचित हूँ तो अस्तित्व में है तो मेरा इस विषय से परिचित होने का फलस्वरूप मुझे यह ज्ञान प्राप्त होता है कि यह विषय विद्यमान है किन्तु विपर्यतः यह सत्य नहीं कि जब कभी भी मुझे ज्ञान हो सकता है कि किसी प्रकार का कोई विषय अस्तित्व में है, मै या कोई व्याक्ति उस विषय से अवश्य परिचित रहा होगा। इस व्याख्या से स्पष्ट है कि जब कोई व्यक्ति वस्तुओं की प्रकृति के प्रत्यय का प्रयोग करता है तो वह सत्य का ज्ञान और वस्तुओं को ज्ञान दो दर्शनिक दृष्टिकोण के मध्य विभेद की अनदेखा करता है।

96. निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए एवं दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए

मैं अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र के अभिप्राय का समर्थन करना चाहूँगा तथा इस समर्थन से इस स्वरूप के बारे में अनेक महत्वपूर्ण बिंदु उभर कर सामने आते है। इनमें से एक अनिवार्यतः अन्तः शास्त्रीयता है, क्योंकि इसमें जिन समस्याओं का उल्लेख होता है,
वे सामान्यतः जटिल व्यावहारिक समस्याएं होती हैं, जिनके साथ एक से अधिक प्रकार की विशेषज्ञता प्रासंगिक होती है। इसका तात्पर्य यह है कि आवश्यक विशेषज्ञता के इस युग में अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र को यदि समुचित विधि से प्रयुक्त करता है, तो इसे सहयोगात्मक उद्यम होना होगा। विशेषज्ञों के बीच इस प्रकार का सहयोग बिलकुल आसान नहीं है, और दार्शनिक प्रत्येक विशेषज्ञ द्वारा दूसरे विशेषज्ञ के समझ अपने शास्त्र के प्रतिपादन में से सहायता प्रदान कर स्वयं को उपयोगी बना सकता है।
अतः अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र के बारे में मेरे दूसरे बिंदु के लिए अन्य कारण यह है कि, इसमें अन्तर्दृष्टि, कल्पना और संश्लेषण के साथ-साथ विश्लेष्णात्मक विशेषज्ञता की भी आवश्यकता होती है। मेरा तीसरा बिंदु यह है कि सैद्धान्तिक तथा अनुप्रयुक्त दर्शन शास्त्र के बीच कोई सुनिश्चित विभाजन रेखा नहीं है- "अनुप्रयुक्त" समस्याओं से "सैद्धान्तिक" प्रश्न उत्पन्न होंगे (उदाहरणार्थ गर्भ निरोध पर प्रतिबंध से नैसर्गिक नियम की अवधारणा की न्यायसंगतता का प्रश्न उत्पन्न होता है), तथा "सैद्धान्तिक" दर्शन शास्त्र के सिद्धान्तों का अनुप्रयोग विशिष्ट समस्याओं (उदाहरणार्थ किसी सिद्धान्त के वैज्ञानिक होने के लिए परीक्षणीयता के मानदंड या प्रयोग मनोविश्लेषणात्मक तथा समाजशास्त्रीय अभिकथनों में किया जा सकता है।)
चौथा बिंदु यह है कि दूसरी तरफ भी जीवन की किसी समस्या के संबंध में अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र तथा सामान्य बुद्धि के अनुप्रयोग के बीच कोई सुनिश्चित विभाजन नहीं है ("प्रत्येक व्यक्ति का अपना अनुप्रयुक्त दार्शनिक होना") परंतु प्रत्येक व्यक्ति की सैद्धान्तिक दर्शनशास्त्र में रुचि नहीं होती है, और न ही इसके लिए वह समर्थ होता है; तथा सैद्धान्तिक दर्शनशास्त्र में प्रत्येक वस्तु के व्यापक आपादान नहीं होते हैं (उदाहरणार्थ मुझे संदेह है कि गणित के दर्शनशास्त्र के ऐसे कोई आपादान है।)
अतः हम अब यह देख सकते हैं कि यह सत्य है कि यद्यपि दर्शनशास्त्र के अपने विशिष्ट सरोकार हैं जो अनिवार्यतः व्यापक रुचि अथवा प्रासंगिकता के नहीं हैं (सैद्धान्तिक दर्शनशास्त्र की), तथापि यह भी सत्य है कि दर्शनशास्त्र “सामान्य जीवन के महत्वपूर्ण प्रश्नों" के लिए प्रासंगिक हो सकता है, और होना भी चाहिए।
अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र के स्वरूप के बारे में उठाये गये महत्वपूर्ण बिंदु है:
(A) यह स्वरूप में अंतः शास्त्रीय है।
(B) इसमें प्रतिपादन के बिना तथ्यों से जुड़े रहने की आवश्यकता होती है।
(C) सैद्धान्तिक तथा अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र में कोई सुनिश्चित विभाजन नहीं है।
(D) अनुप्रयुक्त सामान्य बुद्धि तथा अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र में कोई स्पष्ट विभाजन नहीं है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनेंः

Correct Answer: (c) केवल A, C और D
Solution:

अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र में निम्नलिखित विशेषताएँ पाई जाती है-
1. इसका स्वरूप अंतशास्त्रीय होता है।
2. सैद्धान्तिक तथा अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र में कोई स्पष्ट विभाजन नहीं है।
3.अनुप्रयुक्त सामान्य बुद्धि तथा अनुप्रयुक्त दर्शन शास्त्र में कोई स्पष्ट विभाजन नहीं है।

97. लेखक को कथन "अनुप्रयुक्त" समस्याओं से 'सैद्धान्तिक' प्रश्न उत्पन्न होते है, का अभिप्राय है:

Correct Answer: (b) अनुप्रयुक्त, समस्याओं का विश्लेषण करने से सैद्धान्तिक दर्शन शास्त्र संबंधी विषय उत्पन्न होते हैं।
Solution:

अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र में जिन समस्याओं का उल्लेख होता है वे सामान्यतः जटिल व्यवहारिक समस्याएँ होती हैं। जिनके साथ एक से अधिक प्रकार की विशेषज्ञता प्रासंगिक होती है। अनुप्रयुक्त समस्याओं से सैद्धान्तिक प्रश्न उत्पन्न होते हैं। जैसे- गर्भ निरोध पर प्रतिबंध से नैसर्गिक नियम की अवधारणा की न्यायसंगतता का प्रश्न उत्पन्न होता है तथा सैद्धान्तिक दर्शनशास्त्र के सिद्धान्तों का अनुप्रयोग विशिष्ट समस्याओं के अभिकथनों में किया जा सकता है।

98. नीचे दो कथन दिए गए हैं:

कथन I: अवतरण के अनुसार सभी सैद्धान्तिक चिंतनों के अनिवार्यतः अनुप्रयोग है।
कथन-II: अवतरण के अनुसार अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र का विचार जीवन के अनुभव के संबंध में महत्वपूर्ण प्रश्नों के प्रति दर्शनशास्त्र की प्रासंगिकता पर आधारित है।
उपयुक्त कथनों के आलोक में निम्नलिखित विकल्पों में से सही उत्तर चुनेंः

Correct Answer: (d) कथन । असत्य है, किन्तु कथन II सही है।
Solution:

कथन - I अवतरण के अनुसार, सभी सैद्धान्ति चिंतनों के अनिवार्यतः अनुप्रयोग है' असत्य है परन्तु कथन- अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र का विचार जीवन के अनुभव के संबंध में महत्वपूर्ण प्रश्नों के प्रति दर्शनशास्त्र की प्रासंगिकता पर आधारित है, सत्य है।

99. नीचे दो कथन दिए गए हैं: एक को अभिकथन (A) और दूसरे को तर्क (R) कहा गया है।

अभिकथन (A): दार्शनिक प्रत्येक विशेषज्ञ द्वारा दूसरे विशेषज्ञ के समक्ष अपने शास्त्र के प्रतिपाक्ष में उसे सहायता प्रदान कर स्वयं को उपयोगी बना सकता है।
तर्क (R) : दर्शनशास्त्र को अनुप्रयुक्त शास्त्र बनने के लिए अनिवार्यतः अंतःशास्त्रीय के रूप में विचार किया जाना चाहिए।
उपर्युक्त कथनों के आलोक में निम्नांकित विकल्पों में से सही उत्तर चुनेंः

Correct Answer: (a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
Solution:

दार्शनिक प्रत्येक विशेषज्ञ द्वारा दूसरे विशेषज्ञ के समक्ष अपने शास्त्र के प्रतिपक्ष में उसे सहायता प्रदान कर स्वयं को उपयोगी बना सकता है। इसका कारण यह है कि दर्शनशास्त्र को अनुप्रयुक्त शास्त्र बनने के लिए अनिवार्यतः अंतः शास्त्रीय के रूप में विचार किया जाना चाहिए। अतः स्पष्ट है कि कथन A और तर्क-R दोनों सहीं हैं तथा तर्क द्वारा कथन की व्याख्या की जा रहीं है।

100. नीचे दो कथन दिए गए हैं: एक को अभिकथन (A) और दूसरे को तर्क (R) कहा गया है।

अभिकथन (A): गद्यांश के अनुसार, कतिपय अर्थ में हम सभी अपने दैनिक जीवन में दर्शनशास्त्र का अनुप्रयोग करते है।
तर्क (R): हम जीवन की समस्याओं पर सामान्य बुद्धि का सदप्रयोग करते हैं तथा अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र और सामान्य बुद्धी के अनुप्रयोग में कोई सुनिश्चित भेद नहीं है।
उपर्युक्त कथनों के आलोक में निम्नांकित विकल्पों में से सही उत्तर चुनेंः

Correct Answer: (a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
Solution:

उपरोक्त गद्यांश के अनुसार, कुछ अर्थ में हम सभी अपने दैनिक जीवन में दर्शनशास्त्र का अनुप्रयोग करते हैं। इसका कारण यह है कि हम जीवन की समस्याओं में सामान्य बुद्धि का सप्रयोग करते है। तथा अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र तथा सामान्य बुद्धि के अनुप्रयोग में कोई सुनिश्चित भेद नहीं है। अतः स्पष्ट है कि कथन (A) और तर्क (R) दोनों सत्य है तथा तर्क द्वारा कथन की व्याख्या की जा रही है।