NTA यू.जी.सी. नेट/जेआरएफ परीक्षा, जून 2023 राजनीति विज्ञान (Political Science) (SHIFT-I)

Total Questions: 100

91. निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उसके आधार पर प्रश्न के उत्तर दीजिए।

यह तर्क दिया जाता है कि वैश्विक न्याय सिद्धांतो का स्पष्ट लक्ष्य दुनिया को एक राजनीतिक इकाई के रूप में अवधारणा बनाकर उदारवाद के सिद्धांतों को सार्वभौमिक बनाना है। डारेल मोएलैंडोर्फ ने तर्क दिया है कि अगर हम एक राष्ट्रराज्य की सीमाओं के भीतर न्याय का समर्थन कर सकते हैं, तो वही कारण विश्व स्तर पर न्याय का समर्थन करने के लिए लागू होता है। 1972, में दार्शनिक पीटर सिंगर ने एक प्रभावशाली निबंध 'अकाल, संपन्नता और नैतिकता' में न्याय के साथ जुड़े नैतिकता के वैश्विक पहलुओं के बारे में अपने मुख्य तर्क प्रकाशित किए।

उन्होंने प्रतिबिंबित किया कि भुखमरी, बुनियादी स्वास्थ्य और चिकित्सा सुविधाओं या आश्रय की कमी के कारण पीड़ा और मृत्यु केवल बुरी हैं। यदि समृद्ध पश्चिम के लोगों में तुलनीय महत्व के किसी भी चीज का त्याग किए बिना कुछ बुरा होने से रोकने की क्षमता है, तो वे ऐसा करने के लिए नैतिक रूप से बाध्य हैं। अजनबियों की जरूरत, यानी अपने ही देशवासियों या पड़ोसियों के अलावा अन्य लोगों की जरूरतें भी नैतिक रूप से उतना ही मजबूर करती हैं।

बाद की एक किताब 'वन वर्ल्ड' में सिंगर ने इस तर्क को और आगे बढ़ाया और कहा कि दुनिया आपस में जुड़ी हुई है और घनिष्ठ रूप से संबंधित है, इसलिए हमें न्याय की सीमा पार नैतिक या वैश्विक समझ की आवश्यकता है। थॉमस नगेल बहस में जोड़ते हुए कहते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक सिद्धांत में हम कम से कम यह विवादास्पद दावा कर सकते हैं कि हम एक न्यायपूर्ण दुनिया में नहीं रहते हैं।

वैश्विक गरीबी, भूखमरी, कुपोषण और संबंधित कारणों से होने वाली मौतों की समस्याओं से निपटने के लिए सबसे प्रभावी तरीकों के बारे में असहमति के लिए काफी गुंजाइश हो सकती है: लेकिन, अगर हम नैतिक अहंकारी नहीं है, तो न्याय की किसी भी मांग के अलावा, किसी भी तरह की मानवीय सहायता की स्पष्ट रूप से आवश्यकता होती है। वैश्विक न्याय पर बहस लगभग तीन दशकों से शैक्षणिक और बौद्धिक मंचों पर की जा रही है और इस पर काफी ध्यान दिया गया है।

वैश्विक न्याय का प्रत्यक्ष दार्शनिक आधार क्या है? 

Correct Answer: (b) उदारवाद का सार्वभौमीकरण
Solution:

वैश्विक न्याय सिद्धांतों का स्पष्ट लक्ष्य दुनिया को एक राजनीतिक इकाई के रूप में अवधारणा बनाकर उदारवाद के सिद्धांतो को सार्वभौमिक बनाना है।

92. किसने कहा कि हम एक न्यायपूर्ण विश्व में नहीं रहते है?

Correct Answer: (c) थॉमस नगेल
Solution:

थॉमस नगेल कहते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक सिद्धांत में हम कम से कम यह विवादस्पद दावा कर सकते हैं कि हम एक न्यायपूर्ण दुनिया में नहीं रहते हैं।

93. इस गद्यांश के अनुसार, राष्ट्रीय नेताओं को किस बात पर सहमति बनाने में कठिनाई होती है?

Correct Answer: (a) जरूरतमंदों को मानवीय सहायता दी जानी चाहिए।
Solution:

इस गद्यांश के अनुसार, राष्ट्रीय नेताओं को वैश्विक न्याय के संबंध में सर्वाधिक प्रभावी पद्धतियों पर सहमति बनाने में कठिनाई होती है।

94. इस गद्यांश में किसे 'बुरा' नहीं कहा गया है?

Correct Answer: (d) गरीबी से जुड़ी बीमारियाँ
Solution:

इस गद्यांश में केवल भुखमरी, बुनियादी स्वास्थ्य और चिकित्सा सुविधाओं या आश्रय की कमी के कारण पीड़ा और मृत्यु केवल बुरी हैं।

95. प्रसिद्ध निबंध, 'अकाल, सम्पन्नता और नैतिकता' के लेखक कौन है?

Correct Answer: (b) पीटर सिंगर
Solution:

1972 में दार्शनिक पीटर सिंगर ने एक प्रभावशाली निबंध 'अकाल, संपन्नता और नैतिकता' में न्याय के साथ जुड़े नैतिकता के वैश्विक पहलुओं के बारे में अपने मुख्य तर्क प्रकाशित किए।

96. निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उसके आधार पर प्रश्न के उत्तर दीजिए।

बुद्ध ने राजनीति को स्वयं में एक साध्य के रूप में नहीं देखा, बल्कि एक ऐसे उपकरण साधन के रूप में देखा जो किसी व्यक्ति की निजी उन्नति के लिए या तो अनुकूल परिस्थितियाँ उपलब्ध करा सकती है या हानिप्रद अवरोध उत्पन्न कर सकती है। उनकी मान्यता थी कि सामाजिक व्यवस्था और कल्याण उपलब्ध कराने के लिए सरकार आवश्यक है और इसके मूल्यों, अ वस्तु और प्रक्रियाओं को 'धर्म' के साथ सुसंगत होना चाहिए। यहाँ धर्म का तात्पर्य बुद्ध की शिक्षाओं और उनके कार्यान्वयन से है जिन्हें सार्वभौम या प्राकृतिक नियमों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

इन नियमों की रचना बुद्ध ने नहीं की। ये बुद्ध के होने या न होने से निरपेक्ष हैं। लेकिन बुद्ध ने इन नियमों को उ‌द्घाटित किया और यह अनुशंसा की हम, अंधे विश्वास से नहीं बल्कि तार्किक मानवीय आकलन के माध्यम से उन नियमों की पड़ताल करें और उनके अनुसार कार्य करें। धर्म का राजनीति के लिए प्रासंगिक एक मूलभूत सिद्धान्त है- सभी व्यक्तियों की समानता और सम्मान।

बुद्ध ने इस बात पर जोर दिया कि सभी मनुष्यों में एक अन्तर्निष्ठ योग्यता और प्रबोधन की क्षमता होती है, जिसे 'बुद्ध प्रकृति' कहा गया। उस समय प्रचलित कर्मकांड आधारित शिक्षाओं के विपरीत बुद्ध ने जाति व्यवस्था को अस्वीकार किया और तर्क दिया कि पूरे समाज में सदगुणों का वितरण समान ढंग से हुआ है, श्रेणीबंध ढंग से नहीं।

बुद्ध की शिक्षाओं में समानता का सिद्धान्त तब भी प्रतिबिम्बित होता है जब वह बताते हैं कि राजतंत्र, अपने जीवनकाल में, किसी दैवीय अधिकार पर नहीं बल्कि लोकप्रिय सहमति पर आधारित होना चाहिए, उनका संचालन शासितों के परामर्श के साथ होना चाहिए, उसे न्याय के क्रियान्वयन में निष्पक्ष होना चाहिए और धर्म के अनुसार चलना चाहिए। बुद्ध के अपने राजनैतिक सृजन, संघ में प्रवेश, भागीदारी, प्रशासन और विवादों के समाधान सम्बन्धी नियम कठोर समानता के सिद्धान्त से निर्देशित होते थे।

नीचे दो कथन दिए गए हैं: एक अभिकथन के रूप में लिखित है तो दूसरा उसके कारण के रूप में:

अभिकथन A: निर्वाण प्राप्त करने की प्रक्रिया में बुद्ध द्वारा जाति-व्यवस्था की प्रासंगिकता को नकार देने से जाति-व्यवस्था अमान्य हो गई।
कारण R: बुद्धवादी विश्वास करते हैं कि हर जीवित प्राणी दूसरे प्राणी के समान है।

उपरोक्त कथन के आलोक में, नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर का चयन कीजिए:

Correct Answer: (a) A और R दोनों सत्य हैं और R, Aकी सही व्याख्या है।
Solution:

निर्वाण प्राप्त करने की प्रक्रिया में बुद्ध द्वारा जाति- व्यवस्था की प्रासंगिकता को नकार देने से जाति व्यवस्था अमान्य हो गई क्योंकि बुद्धिवादी विश्वास करते है कि हर जीवित प्राणी दूसरे के समान है।

97. निम्नलिखित में से कौन सत्य नहीं है?

Correct Answer: (c) बुद्ध, इस बात को अस्वीकृत करते हैं कि सभी मनुष्यों में अन्तर्निहित योग्यता और प्रबोधन की क्षमता होती है।
Solution:

बुद्ध ने इस बात को अस्वीकृत नहीं बल्कि जोर दिया कि सभी मनुष्यों में एक अन्तनिष्ठि योग्यता और प्रबोधन की क्षमता होती है,जिसे "बुद्धि प्रकृति” कहा गया।

98. नीचे दो कथन दिए गए हैं:

कथन I: बुद्ध सरकार के लिए लोकप्रिय सहमति में विश्वास करते थे।
कथन II: बुद्ध कहते हैं कि लोगों के दैवीय अधिकार होते हैं।

उपरोक्त कथन के आलोक में, नीचे दिए गए विकल्पों में से सबसे उपयुक्त उत्तर का चयन कीजिए:

Correct Answer: (c) कथन I सही है, लेकिन कथन II गलत है।
Solution:

बुद्ध का मानना है कि राजतंत्र अपने जीवनकाल में किसी दैवीय अधिकार पर नहीं बल्कि लोकप्रिय सहमति पर आधारित होना चाहिए।

99. निम्नलिखित में से कौन 'संघ' के बारे मे असत्य है-

Correct Answer: (c) यह केन्द्रीकृत रूप से शासित होता था।
Solution:

बुद्ध के अपने राजनैतिक सृजन संघ में प्रवेश भागीदारी,प्रशासन और विवादों के समाधान सम्बन्धी नियम कठोर समानता केसिद्धांत से निर्देशित होते थे।

100. निम्नलिखित में से कौन-से कथन सत्य हैं?

A. बुद्धवादी परिप्रेक्ष्य के अनुसार प्राकृतिक वस्तुओं औ प्राकृतिक नियमों का सृजन ईश्वर या किसी अन्यपारलौकिक शक्ति ने नहीं किया है।
B. बुद्ध की मान्यता थी कि सरकार की वैधता का आधार शासक और शासित का 'धर्म' आधारित आचरण है।
C. बुद्धवादी यह तर्क देते हैं कि पूरे समाज में सदगुणों का वितरण समान रूप से हुआ है, न कि श्रेणीबद्ध ढंग से।
D. बुद्ध का अपना सृजन, 'संघ', ईश्वर द्वारा शासित था।

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर का चयन कीजिए:

Correct Answer: (a) केवल A, B, C
Solution:

बुद्धवादी यह तर्क देते है कि पूरे समाज में सद्‌गुणों का वितरण समान रूप से हुआ है, न कि श्रेणी बद्ध ढंग से। बुद्ध की मान्यता थी कि सरकार की वैधता का आधार शासक और शासित का 'धर्म' आधारित आचरण है। बुद्धिवादी परिप्रेक्ष्य के अनुसार प्राकृतिक वस्तुओं और प्राकृतिक नियमों का सृजन ईश्वर या किसी अन्य पारलौकिक शक्ति ने नहीं किया है।