विनायक दामोदर सावरकर भारत के उत्साही राष्ट्रवादी, क्रान्तिकारी तथा प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी के रूप में जाने जाते हैं। वह भारत में हिन्दू राष्ट्रवाद के पुनरुत्थान के प्रेरणादायी शक्ति के रूप में भी जाने जाते हैं। ब्रिटिशों के द्वारा वीर सावरकर को अंडमान में बंदी बना कर रखा गया था।
सावरकर का हिंदुत्व सिद्धांत व्यापक था। उनके लिए हिंदुत्व न सिर्फ हिन्दुओं के धार्मिक सिद्धांत हैं बल्कि उनके जीवन के सांस्कृतिक, सामाजिक राजनीतिक और भाषायी पहलू भी हैं। अपनी महान कृति हिंदुत्व (1923) में सावरकर ने इस बात पर जोर दिया कि हिन्दू वह व्यक्ति है जो भारतवर्ष के इस भूमि का आदर करता है- सिन्धु से लेकर समुद्र तक- अपनी पितृभूमि के साथ-साथ पवित्र भूमि की तरह, जो उनके धर्म की पालन भूमि है।
अहमदाबाद (1937) में हुए हिन्दू-महासभा के अपने अध्यक्षीय भाषण के दौरान सावरकर ने कहा कि हिन्दुओं का एक समान पवित्र भूमि है। वैदिक ऋषि इनके समान गर्व हैं, पाणिनि और पतंजलि व्याकरण ज्ञाता, भवभूति और कालिदास कवि, श्रीराम और श्रीकृष्ण इनके हीरो, शिवाजी और प्रताप, गुरु गोविन्द और बंदा बहादुर इनके प्रेरणा के सामान्य रूप में पूजनीय हैं ---- हर तरह की परीक्षा जो किसी प्रकार की सामान्य देश, जाति, धर्म, भाषा आदि की हो भी व्यक्ति को एक राष्ट्र बनाने की योग्यता देता है,
हिन्दुओं को भी पूरे गर्व के साथ यह योग्यता प्रदान करता है। सावरकर एक प्रमुख लेखक तथा वक्ता भी थे। उनकी कुछ प्रमुख कृतियों में 'एन इको फ्रॉम अंडमान', "हिन्दू पदपादशाही', 'दि इंडियन वार ऑफ इंडिपेंडेंस' शामिल हैं।
अवतरण के अनुसार, हिन्दू महासभा की अहमदाबाद मीटिंग हुई -