Solution:आचार्य क्षेमेन्द्र ने काव्य के सूक्ष्माति सूक्ष्म अवयव से लेकर उसके विशालतम रूप को ध्यान में रखते हुए, औचित्य के 27 भेद निर्धारित किए है।
आचार्य क्षेमेन्द्र ने औचित्य मत का प्रतिपादन कर उसे काव्य के प्राण रूप में प्रतिष्ठित किया। उनका कथन है-
अलंकारास्त्वलंकारा गुणा एवं गुणाः सदा।
औचित्यं रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् ।।
इससे स्पष्ट होता है कि अलंकार और गुण तो अलग तत्त्व है, पर रससिद्ध काव्य की स्थिरता औचित्य तत्व पर ही निर्भर करती है, अतः औचित्य प्राण है। जब शरीर में प्राण है, तभी अलकारों और गुणों की शोभा टिकती है तथा उसमें रस का संचार हो सकता है, पर प्राणों से रहित होकर उसमें उपर्युक्त कोई भी विशेषता नहीं रह जाती है। क्षेमेन्द्र के विचार से औचित्य के भेद हैं- पद वाक्य, प्रबन्ध, गुण, अलंकार, रस, क्रिया, कारक, लिंग, वचन, विशेषण, उपसर्ग, निपात, काल, देश, कुल, व्रत, तत्त्व, सत्त्व, अभिप्राय, स्वभाव, सारसंग्रह, प्रतिभा, अवस्था, विचार, नाम, आशीष के औचित्य संयोजन रूप।