Solution:"रचनाएँ स्वयं पाठकों ...... विधा नहीं है। उपर्युक्त कथन विवेकीराय का है। यह कथन 'उठ जाग मुसाफिर' से उद्धृत है। विवेकीराय ललित निबन्धकार है। इनके प्रमुख निबंध है-
(1) मनबोध मास्टर की डायरी
(2) गंवई गंध गुलाब 1980 ई.
(3) फिर बैतलवा डाल पर - 1962 ई.
(4) आस्था और चिन्तन - 1991 ई.
(5) किसानों का देश -1956 ई.
(6) उठ जाग मुसाफिर 2012 ई.हजारी द्विवेदी ललित निबन्धकार है। इनके प्रमुख निबन्ध संग्रह है- (1) अशोक के फूल (2) कल्पलता (3) मध्यकालीन धर्म साधना (4) विचार वितर्क (5) कुटज (6) आलोक पर्व। इनके अन्य निबन्ध है- कल्पतरु, साहित्य सहचर, नाखून क्यों बढ़ते है, देवदारु, बंसत आ गया, वर्षा घनपति से घनश्यामा तक, मेरी जन्मभूमि, परम्परा और आधुनिकता विद्यानिवास मिश्र के निबन्ध है- गांधी का करूण रस, चिड़िया रैन बसेरा, छितवन की छाँह, हल्दी धूप, कदम की फूली डाल, आँगन का पंछी और बंजारा मन, मैने सिल पहुँचाई, फागुन दुइ रे दिन, बसन्त आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं, साहित्य के सरोकार ।
कुबेरनाथ राय के निबन्ध है- प्रिया नीलकंठी, रस आखेटक, गंधमादन, निषाद बांसुरी, विषादयोग, पर्णमुकुट, महाकवि की तर्जनी, पत्र मणिपुतुल के नाम, मन पवन की नौका, किरात नदी में चन्द्रमधु, दृष्टि अभिसार, मराल, आगम की नाव, उत्तर कुरू।