भक्ति आंदोलन पहले शहरों में बसने वाले लोगों, खासकर छोटे-छोटे व्यापारियों, जुलाहों, टोकरी बनाने वालों और भिश्तियों जैसे लोगों के बीच से शुरू हुआ था। किन्तु सत्रहवीं शताब्दी तक वह किसानों में भी व्याप्त हो गया। इसने एक जन आंदोलन का रूप धारण कर लिया और मुगल शासन तथा सामन्ती सरदारों के विरुद्ध कभी-कभी सशस्त्र विद्रोहों के रूप में भी प्रकट हुआ। इस आंदोलन के नेता अपनी कवितायें और अपने गीत फारसी और संस्कृत जैसी दुरूह और क्लिष्ट भाषाओं में नहीं, वरन जनता की भाषाओं में रचते थे। इससे राष्ट्रीय इकाइयों तथा राष्ट्रीय भाषाओं के विकास को प्रोत्साहन मिला, जो भारतीय राष्ट्र के विकास की एक ऐतिहासिक प्रक्रिया थी।
भक्ति आंदोलन ने देश के भिन्न-भिन्न भागों में, भिन्न-भिन्न मात्राओं में तीव्रता और वेग ग्रहण किया। यह आंदोलन विभिन्न रूपों में प्रकट हुआ। किन्तु कुछ मूलभूत सिद्धांत ऐसे थे जो समग्र रूप से पूरे आंदोलन पर लागू होते थे- पहले, धार्मिक विचारों के बावजूद जनता की एकता को स्वीकार करना; दूसरे, ईश्वर के सामने सबकी समानता; तीसरे, जाति प्रथा का विरोध; चौथे, यह विश्वास कि मनुष्य और ईश्वर के बीच तादात्म्य प्रत्येक मनुष्य के सद्गुणों पर निर्भर करता है, न कि ऊँची जाति अथवा धन-संपत्ति पर; पाँचवे, इस विचार पर जोर कि भक्ति की आराधना का उच्चतम स्वरूप है; और अंत में, कर्मकाण्डों, मूर्ति पूजा, तीर्थाटनों और अपने को दी जाने वाली यंत्रणाओं की निन्दा। भक्ति आंदोलन मनुष्य की सत्ता को सर्वश्रेष्ठ मानता था और सभी वर्गगत एवं जातिगत भेदभावों तथा धर्म के नाम पर किये जानेवाले सामाजिक उत्पीड़न का विरोध करता था।
किन्तु भक्ति आंदोलन की अपनी सीमाएं थी। भक्ति आंदोलन ने आम जनता में जागृति तो पैदा की, किन्तु वह सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था में मौजूद असंगतियों के वास्तविक कारणों को समझने और मानव के दुखों और पीड़ाओं के नूतन समाधान प्रस्तुत करने में सफल नहीं हुआ। यही एक मुख्य कारण है कि इस आंदोलन की परिणति, जिसने सामन्ती उत्पीड़न और पुरोहिती रूढ़िवाद के विरुद्ध जनता को संयुक्त किया था, अन्ततः घोर संकीर्णता वाद में हुई।
उपर्युक्त अनुच्छेद के अनुसार, भक्ति आंदोलन की सीमा क्या थी?
Correct Answer: (a) वह मनुष्य की पीड़ाओं का नया समाधान न दे सका।
Solution:भक्ति आन्दोलन मनुष्य की पीड़ओं का नया समाधान न दे सका, यही भक्ति आन्दोलन की सीमा थी। भक्ति आंदोलन ने आम जनता में जागृति तो पैदा की, किन्तु वह सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था में मौजूद असंगतियों के वास्तविक कारणों को समझने और मानव के दुःखों और पीड़ाओं के नूतन समाधान प्रास्तुत करने में सफल नहीं हुआ।