NTA यू.जी.सी. नेट/ जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर-2022 (हिन्दी) Shift-II

Total Questions: 100

21. 'जैसे-जैसे उच्चस्तरीय वर्ग में गबन, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और वंशवाद अपनी जड़ें मजबूत करता जाता है, वैसे-वैसे यह उपन्यास और ज्याद प्रासंगिक होता जा रहा है।' यह कथन किस उपन्यास के लिए उसके उपन्यासकार ने पुनर्प्रकाशन की भूमिका में लिखा था?

Correct Answer: (d) राग दरबारी
Solution:

'जैसे-जैसे उच्चस्तरीय वर्ग में गबन, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और वंशवाद अपनी जड़ें मजबूत करता जाता है, वैसे-वैसे यह उपन्यास और ज़्यादा प्रासंगिक होता जा रहा है।' यह कथन 'राग दरबारी' उपन्यास के लिए उसके उपन्यासकार ने पुनर्प्रकाशन की भूमिका में लिखा था।
श्रीलाल शुक्ल कृत 'राग दरबारी' उपन्यास का प्रकाशन 1968 ई. में हुआ। इनके अन्य उपन्यास सूनी घाटी का सूरज (1957 ई.), अज्ञातवास (1962 ई.), सीमाएँ टूटती हैं (1973 ई.), मकान (1976 ई.), पहला पड़ाव (1976 ई.), विश्रामपुर का संत (1998 ई.)।
मन्नू भण्डारी के उपन्यास - आपका बंटी (1971 ई.), महाभोज (1979)
काशीनाथ सिंह के उपन्यास - काशी का अस्सी, अपना मोर्चा, रेहन पर रघू, महुआ चरित । दूधनाथ सिंह के उपन्यास  - आखिरी कलाम, निष्कासन, नमो अंधकारम आदि।

22. "वतन की फ़िक्र कर, ज्यादा मुसीबत आने वाली है।

तेरी बरबादियों के तज़करे हैं आसमानों में।"
यह छंद किस उपन्यास में आया है:

Correct Answer: (b) तमस
Solution:"वतन की फ़िक्र कर, ज्यादा मुसीबत आने वाली है।
तेरी बरबादियों के तज़करे हैं आसमानों में ।।"
पर्युक्त छंद 'तमस' उपन्यास में आया है। भीष्म साहनी कृत 'तमस' उपन्यास (1973 ई.) भारत विभाजन की साम्प्रदायिक विभीषिका की त्रासदी का अंकन है।
इनके अन्य उपन्यास- झरोखे (1967 ई.), कड़ियाँ (1970 ई.), वसंती (1980 ई.), मय्यादास की माड़ी (1988 ई.), कुंतो (1993 ई.), नीलू नीलिमा नीलोफर (2000 ई.)।

जबकि 'झूठा सच' यशपाल का 'जिंदगी नामा' कृष्णासोबती का तथा 'राग दरबारी' श्री लाल शुक्ल का उपन्यास है।

23. 'पुरुष निसंग है, स्त्री आसक्त, पुरुष निर्द्वन्द है, स्त्री द्वन्द्वोन्मुखी, पुरुष मुक्त है, स्त्री बद्ध।'- यह कथन किस चरित्र का है?

Correct Answer: (d) महामाया भैरवी
Solution:'पुरुष निसंग है, स्त्री आसक्त, पुरुष निर्द्वन्द है, स्त्री द्वन्द्रोन्मुखी, पुरुष मुक्त है, स्त्री बद्ध ।' यह कथन 'महामाया भैरवी' का है।
• 'बाणभट्ट की आत्मकथा' (1946 ई.) हजारी प्रसाद द्विवेदी का ऐतिहासिक उपन्यास है। जिसमें प्रेम का उदान्तीकरण एवं हर्षकालीन सामाजिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक स्थिति का चित्रण है।
इसके प्रमुख पात्र - बाणभट्ट, निपुणिका, निउनिया, अघोर भैरव, भट्टिनी, महामाया, आदि।

24. 'उसका युवापन एक प्रतिष्ठा की जिद कहीं चुराए बैठा है। वह इस प्रतिष्ठा के आगे कभी बहुत मजबूर, कभी कमज़ोर हो जाता है और उसे भुगत भी रहा है।'

उपर्युक्त कथन किस कहानी से उद्धृत है?

Correct Answer: (c) पिता
Solution:'उसका युवापन एक प्रतिष्ठा की जिद कहीं चुराए बैठा है। वह इस प्रतिष्ठा के आगे कभी बहुत मजबूर, कभी कमज़ोर हो जाता है और उसे भुगत भी रहा है।' उपर्युक्त कथन 'पिता' कहानी से उद्धृत है।
ज्ञान रंजन की प्रमुख कहानियाँ - पिता, घण्टा, बहिर्गमन, सीमाएँ।
जैनेद्र की कहानियाँ  - स्पर्द्धा, पत्नी, एक कैदी, अपना-अपना भाग्य, बाहुबली, लाल सरोवर, मास्टर जी, ।
अज्ञेय की कहानियाँ - रोज (गैंग्रीन), मेजर चौधरी, कविप्रिया, रमन्ते तत्र देवता, नारंगियाँ, पुरुष का भाग्य आदि।
कमलेश्वर के कहानी संग्रह - राजा निरबंसिया, कस्बे का आदमी, खोई हुई दिशाएं, मांस का दरिया, बयान, आजादी-मुबारक आदि।

25. माँ के हाथ की बनी कौन सी कला को देखकर चीफ प्रसन्न हो गए?

Correct Answer: (d) फुलकारी
Solution:माँ के हाथ की बनी  'फुलकारी' कला को देखकर चीफ प्रसन्न हो गए।
'भीष्म साहनी कृत, चीफ की दावत' कहानी का मुख्य उद्देश्य मध्यम वर्गीय लोगों की मानसिकता और बदलते संबंधों की विडंबना का वास्तविक चित्रण है।
इनकी प्रमुख कहानी संग्रह  - भाग्य रेखा (1953ई.), पहला पाठ (1957ई.), भटकती राख (1966ई.), पटरियाँ (1973ई.), वाड्चू(1978 ई.), शोभायात्रा (1981ई.), निशाचर (1983ई.), पाली (1989 ई.), डायन (1998 ई.) आदि।

26. निम्नांकित में से कौन सा गीत 'तीसरी कसम' कहानी में नहीं है-

Correct Answer: (a) 'नान्हीं नान्हीं दंतवा, पातर ठोरवा छटकै जैसन बिजलिया ........!'
Solution:

निम्नलिखित में से 'नान्हीं नान्हीं दंतवा, पातर ठोरवा छटकै जैसन बिजलिया....।

गीत, तीसरी कसम कहानी में नहीं है। जबकि अन्य सभी गीत 'तीसरी कसम' कहानी में है। तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम, ठेस, पंचलाइट, रस प्रिया, लाल पान की बेगम तथा तीन बिंदिया 'फणीश्वरनाथ रेणु की कहानियाँ हैं।'

27. सिद्धों और नाथपंथी योगियों के चिंतन का विवेचन करते हुए यह किसने कहा था कि उनकी रचनाओं का जीवन की स्वाभाविक सरणियों, अनुभूतियों और दशाओं से कोई संबंध नहीं था।

Correct Answer: (b) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
Solution:

सिद्धों और नाथपंथी योगियों के चिंतन का विवेचन करते हुए 'आचार्य रामचन्द्र शुक्ल' ने कहा था कि उनकी रचनाओं का जीवन की स्वाभाविक सरणियों, अनुभूतियों और दशाओं से कोई संबंध नहीं था।
• आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा- "शंकराचार्य के बाद इतना प्रभावशाली और इतना महिमान्वित भारतवर्ष में दूसरा नहीं हुआ। भारतवर्ष के कोने-कोने में उनके अनुयायी आज भी पाये जाते हैं। भक्ति आंदोलन के पूर्व सबसे शक्तिशाली धार्मिक आन्दोलन गोरखनाथ का भक्ति मार्ग ही था। गोरखनाथ अपने युग के सबसे बड़े नेता थे।"

28. "त्रस्त प्रजा की रक्षा के लिए, सतीत्व के सम्मान के लिए, देवता ब्राह्मण और गौ की मर्यादा में विश्वास के लिए, आतंक से प्रकृति को आश्वासन देने के लिए आपको अपने अधिकार का उपयोग करना होगा।" 'स्कंदगुप्त' नाटक में यह संवाद किसके द्वारा कहा गया है?

Correct Answer: (a) पर्णदत्त
Solution:"त्रस्त प्रजा की रक्षा के लिए, सतीत्व के सम्मान के लिए, देवता ब्राह्मण और गौ की मर्यादा में विश्वास के लिए, आतंक से प्रकृति को आश्वासन देने के लिए आपको अपने अधिकार का उपयोग करना होगा।" 'स्कंदगुप्त' नाटक में यह संवाद (पर्णदत्त) के द्वारा कहा गया है।

'स्कन्द गुप्त' नाटक (1928 ई.) जयशंकर प्रसाद के द्वारा रचित है।
इस नाटक के प्रमुख पात्र - पृथ्वी सेन, स्कन्दगुप्त, भट्टार्क, बंधु वर्मा, महादंडनायक, पुरुगुप्त, कुमारगुप्त, देवसेना, विजया, मातृगुप्त, सर्वनाग, देवकी, अनन्तदेवी, जयमाला, खिंगिल, मुगल आदि।
जयशंकर के अन्य नाटक- सज्जन, कल्याणी परिणय, राज्यश्री, अजातशत्रु, चन्द्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी आदि।

29. निम्नलिखित में से कौन सा पात्र 'चन्द्रगुप्त' नाटक से संबंधित नहीं है?

Correct Answer: (c) जयमाला
Solution:

'जयमाला' चन्द्रगुप्त नाटक से संबंधित पात्र नहीं है। जबकि एलिस, लीला तथा नीला 'चंद्रगुप्त' नाटक से संबंधित पात्र हैं। जयशंकर प्रसाद कृत 'चन्द्रगुप्त' (1931 ई.) नाटक का कथानक प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटनाओं अलक्षेन्द्र का आक्रमण, नंदवंश का नाश, सिल्युकस का पराभव, चंद्रगुप्त की प्रतिष्ठा के आधार पर निर्मित है।

नाटक के प्रमुख पात्र - चन्द्रगुप्त, चाणक्य, शकटार, सिंहरण, आम्भीक, राक्षस, पर्वतक, सिल्युकस, कार्नेलिया, कल्याणी, एलिस, मालविका, अलका, सुवासिनी।

30. "एक निर्देशक की दृष्टि से 'आधे अधूरे' मुझे समकालीन ज़िंदगी का पहला सार्थक हिंदी नाटक लगता है।" - उपयुक्त कथन किसका है?

Correct Answer: (d) ओम शिवपुरी
Solution:"एक निर्देशक की दृष्टि से 'आधे अधूरे' मुझे समकालीन जिंदगी का पहला सार्थक हिंदी नाटक लगता है।" - उपर्युक्त कथन 'ओम शिवपुरी' का है।
'आधे-अधूरे' (1969 ई.) नाटक मोहन राकेश का है।
इनके अन्य नाटक - आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस, पैर तले की जमीन (अधूरा) आदि।