A. 'अश्क' का नाटक 'कैद' काफी मंचित हुआ,जिसके परिवर्द्धित नवीन रूप को बाद में 'लौटता हुआ दिन' के नाम से प्रस्तुत किया गया।
B. पुराण कथा का आधुनिक उपयोग जगदीशचंद्र माथुर के 'पहला राजा' में अत्यंत सर्जनात्मक रूप में हुआ है।
C. प्रसाद का अंतिम नाटक 'स्कन्दगुप्त' है।
D. प्रसाद का नाटक 'धुवस्वामिनी' और भुवनेश्वर का नाटक 'प्रतिभा का विवाह' एक ही वर्ष में प्रकाशित हुए।
E. भुवनेश्वर के नाटकों में प्रेम-संबंधों की पवित्रता एवं कोमलता तथा प्रसाद में प्रेम संबंधी मान्यताओं का सहज तिरस्कार मिलता है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर का चयन कीजिए:
Correct Answer: (b) केवल A, B और D
Solution:नाटक और रंगमंच से संबंधित निम्नलिखित तथ्य हैं-
• उपेन्द्रनाथ 'अश्क' का नाटक 'कैद' काफी मंचित हुआ, जिसके परिवर्द्धित नवीन रूप को बाद में लौटता हुआ दिन के नाम से प्रस्तुत किया गया।
बच्चन सिंह के अनुसार 'अश्क' पहले नाटककार हैं, जिन्होंने हिंदी नाटक को रंगमंच से सम्बद्ध किया और उसे रोमांस के कठघरे से निकालकर आधुनिक भाव बोध के साथ जोड़ा।
• पुराण कथा का आधुनिक उपयोग जगदीशचंद्र माथुर के 'पहला राजा' (1969 ई.), अत्यंत सर्जनात्मक रूप में हुआ है। इस नाटक के संदर्भ में लेखक की उक्ति है, "यह नाटक न पौराणिक है, न ऐतिहासिक, न यथार्थवादी है। यह तो एक 'माडन एलिगोरी' आधुनिक अन्योक्ति का मंचीय रूप है।
• जयशंकर प्रसाद का नाटक 'ध्रुवस्वामिनी' और भुवनेश्वर का नाटक 'प्रतिभा का विवाह' यह दोनों नाटक एक ही वर्ष 1933 ई. में प्रकाशित हुए।
प्रसाद का प्रथम नाटक 'सज्जन' (1910 ई.) तथा अन्तिम नाटक ध्रुवस्वामिनी' (1933 ई.) है। इनके अन्य नाटक कल्याणी परिणय (1912 ई.), विशाख (1921 ई.), अजातशत्रु (1922 ई.), जनमेजय का नागयज्ञ (1926 ई.), कामना (1927 ई.), स्कन्दगुप्त (1928 ई.), चन्द्रगुप्त (1931 ई.)।