Solution:'आगान्धान्तः परिस्पन्दम्' इति श्लोके श्लेषमुखेन 'वाणी नद्योः' वर्णना क्रियते । 'आगान्धान्त परिस्पन्दनम्' इस श्लोक में श्लेष मुख से 'वाणी नदी' का वर्णन करते हैं। अर्थात् सरस्वती (वाणी) मन के आन्तरिक भाग में चमत्कार पैदा करने वाली, देवता और विद्वानों की प्रसन्नता का कारणभूत एकमात्र (स्थान) श्रृंगार आदि विभिन्न रसों की विशिष्टता से समृद्ध प्रवाहित होते हैं।सरस्वती देवी के स्रोत को (प्रवाह को) नमस्कार सरस्वती नदी के पक्ष में अपनी गहरी जलधारा के मध्य में गम्भीर आवर्ती (भँवरों) युक्त राजहंसों की प्रसन्नता की आवास बनी हुई, पृथ्वी के अंदर समृद्ध प्रभावशाली, बहते हुए प्रभाव को नमस्कार करता हूँ। अगान्धान्तः परिस्पन्दं विविधानन्दमन्दिरम्। वन्दे रसान्तरप्रौढ स्रोतः सारस्वतं वहत्।।
नलचम्पू महाभारत के 'वन पर्व' से लिया गया है। नलचम्पू का नायक 'राजा नल' है। नलचम्पू को दमयन्ती कथा भी कहा जाता है।