NTA यू.जी.सी. नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर-2024 संस्कृत

Total Questions: 100

41. विरेचनसिद्धान्तो भवति -

Correct Answer: (a) अरस्तूवर्यस्य
Solution:'अरस्तूवर्यस्य' विरेचनसिद्धान्तो भवति- अर्थात् 'अरस्तु' का विरेचन सिद्धान्त है। विरेचन सिद्धान्त (Catharsis कैथार्सिस) द्वारा अरस्तु ने प्रतिपादित किया कि कला (Art) और साहित्य के द्वारा हमारे दूषित मनोविकारों का उचित रूप से विरेचन हो जाता है। अरस्तु ने इस सिद्धांत के द्वारा कला और काव्य की महत्ता को पुनःप्रतिष्टित करने का सफल प्रयास किया। अरस्तु के गुरु प्लेटो हैं।

42. पुरुषसूक्ताधारेण यज्ञस्य घृतमासीत्-

Correct Answer: (c) वसन्तः
Solution::पुरुषसूक्ताधारेण यज्ञस्य घृतम् 'वसन्तम् आसीत्-
अर्थात् पुरुषसूक्त के आधार पर प्रकृतिरूपी यज्ञ का घृत 'वसन्त ऋतु' है।
यत् पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत ।
वसन्तो अस्यासीदाज्य ग्रीष्म इहमः शरद्धविः ।।

43. सांख्याभिमतविपर्ययभेदानां क्रमं चिनुत -

A. महामोहः
B. अन्धतामियम्
C. तामित्रम्
D. तमः
E. मोहः

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-  

Correct Answer: (c) D, E, A, C, В
Solution:सांख्याभिमतविपर्ययभेदानां क्रमम् अस्ति तमः, मोहः, महामोहः, तामिस्र, अन्धतामिस्र इति उचितं । अर्थात् सांख्य के मत के अनुसार विपर्यय के भेदों का क्रम इस प्रकार है-
(i)  तमस्- 'तमस्' को पतञ्जलि ने 'अविद्या' कहा है,इसके आठ भेद होते हैं।
(ii) मोह- 'मोह' को पतञ्जलि ने 'अस्मिता' कहा है, इसके आठ भेद होते हैं।
(iii) महामोह-'महामोह' को पतञ्जलि ने 'राग' (लत) कहा है, इसके 10 भेद होते हैं।
(iv) तामित्र-तामिस्त्र को पतञ्जलि ने द्वेष (क्रोध) कहा है, इसके अट्ठारह भेद होते हैं।
(v) अन्धतामियम् अन्धतामियम् को पतञ्जलि ने 'अभिनिवेश' कहा है। इसके अट्ठारह भेद होते हैं। योग दर्शन में इन्हें पाँच क्लेशों के नाम से जाना जाता है।

भेदस्तमसोऽष्टविधो मोहस्य च दशविधो महामोहः ।
तामित्रोऽष्टादशधा तथा भवत्यन्तघतामित्रः।।

44. "अगाधान्तः परिस्पन्दम्" इति श्लोके अनयोः वर्णना श्लेषमुखेन क्रियते?

Correct Answer: (a) वाणी नद्योः
Solution:'आगान्धान्तः परिस्पन्दम्' इति श्लोके श्लेषमुखेन 'वाणी नद्योः' वर्णना क्रियते । 'आगान्धान्त परिस्पन्दनम्' इस श्लोक में श्लेष मुख से 'वाणी नदी' का वर्णन करते हैं। अर्थात् सरस्वती (वाणी) मन के आन्तरिक भाग में चमत्कार पैदा करने वाली, देवता और विद्वानों की प्रसन्नता का कारणभूत एकमात्र (स्थान) श्रृंगार आदि विभिन्न रसों की विशिष्टता से समृद्ध प्रवाहित होते हैं।

सरस्वती देवी के स्रोत को (प्रवाह को) नमस्कार सरस्वती नदी के पक्ष में अपनी गहरी जलधारा के मध्य में गम्भीर आवर्ती (भँवरों) युक्त राजहंसों की प्रसन्नता की आवास बनी हुई, पृथ्वी के अंदर समृद्ध प्रभावशाली, बहते हुए प्रभाव को नमस्कार करता हूँ। अगान्धान्तः परिस्पन्दं विविधानन्दमन्दिरम्। वन्दे रसान्तरप्रौढ स्रोतः सारस्वतं वहत्।।

नलचम्पू महाभारत के 'वन पर्व' से लिया गया है। नलचम्पू का नायक 'राजा नल' है। नलचम्पू को दमयन्ती कथा भी कहा जाता है।

45. ध्वनिपरिवर्तनस्य मुख्यानि कारणानि कति ?

Correct Answer: (a) द्वे
Solution:ध्वनिपरिवर्तनस्य मुख्यानि कारणानि 'द्वे' स्तः । अर्थात् ध्वनि परिवर्तन के मुख्य कारण 'दो' है।
(i) आभ्यन्तर कारण (ii) बाह्य कारण।
1.आभ्यन्तर कारण के 10 भेद है, जो इस प्रकार है- (i)प्रयत्नलाघव या मुखसुख (ii) लघूकरण की प्रवृत्ति (iii) अनुकरण की अपूर्वता (iv) अशिक्षा (v) शीघ्र भाषण (vi) भावावेश (vii) काव्यात्मकता (viii) बलाघात (ix) कृत्रिमता (x) भ्रामक व्युत्पत्ति
2. बाह्य कारण बाह्य कारण के 'छः भेद' है, जो इस प्रकार है- (i) भौगोलिक प्रभाव, (ii) सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियाँ (iii) काल प्रभाव या स्वाभाविक विकास (iv) लिपि दोष (v) अन्य भाषाओं का प्रभाव (vi) सादृश्य ।

46. देहात्मवादे "स्थूलोऽहं, कृशोऽहं, कृष्णोऽहम् " इत्यादौ कस्योपपत्तिः ?

Correct Answer: (b) सामानाधिकरण्यस्य
Solution:देहात्मवादे “स्थूलोऽहं, कृशोऽहं, कृष्णोऽहम्” इत्यादौ "सामानाधिकरणस्य" उपपत्तिः ।
देहात्मवाद में "स्थूलोऽहं, कृशोऽहं, कृष्णोऽहम्” इत्यादि वाक्य में सामानाधिकरण की उपपत्ति है। यहाँ वेदान्त सार में नौ मतों का उल्लेख है-

1. अतिप्राकृतस्तु- "आत्मा वै जायते पुत्रः”। 2.चार्याकस्तु- "स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः”। 3. अपरश्चार्वाकः- "ते ह प्राणाः प्रजापति पितरमेत्योचू”। 4. अपरश्चार्वाकः- "अन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः”। 5. अन्यस्तु चार्वाकः- "अन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः"। 6. बौद्धस्तु- "अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः"। 7. प्राभाकरतार्कितौ तु - "अन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः"। 8. भाट्टस्तु- "प्रज्ञानघन एवानन्दमयः। 9. अपरोबौद्धः- "असदेवेदमग्र आसीत्।"

47. अष्टाध्यायीक्रमेण सूत्राणि व्यवस्थापयत

A. भृशादिभ्यो भुव्यच्वेर्लोपञ्च
B. काम्यच्च
C. सुपः आत्मनः क्यच्
D. उपमानादाचारे
E. कर्तुः क्यङ्स लोपश्च

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत- 

Correct Answer: (c) C, B, D, E, A
Solution:अष्टाध्यायी सूत्राणां क्रमेण व्यवस्थापनम् अस्ति-

C. सुपः आत्मनः क्यच् (3 - 1-8)
B. काम्यच्च (3 - 1- 9)
D. उपमानादाचारे (3 - 1 - 10)
E. कर्तुः क्यङ्स लोपश्च (3-1-11)
A. भृशादिभ्यो भुव्यच्वेर्लोपञ्च (3 - 1-12)

• अष्टाध्यायी के सूत्रों का क्रम यही है।

अतः विकल्प (c) सही है।

48. आलयविज्ञान-प्रवृत्तिविज्ञानप्रवाहो भवति

Correct Answer: (d) विज्ञानस्कन्धः
Solution:विज्ञानस्कन्धः' आलयविज्ञान प्रवृत्तिज्ञानप्रवाहो भवति अर्थात् 'विज्ञानस्कन्ध' आलयविज्ञान और प्रवृत्ति विज्ञान का प्रवाह होता है। अतः विकल्प (d) सही है।

49. समीचीनं मेलयत-

सूची १सूची २
A. उपमाI. व्यवहारारोपमूला
B. उत्प्रेक्षाII. सक्रियारूपादिवर्णनमूला
C. समासोक्ति:III. सादृश्यमूला
D. स्वभावोक्ति:IV. सम्भावनामूला

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत- 

Correct Answer: (a) A-III, B-IV, C-I, D-II
Solution:समीचीनं मेलयत अस्ति अर्थात् उचित मेल है-
सूची १सूची २
A. उपमाIII. सादृश्यमूला
B. उत्प्रेक्षाIV. सम्भावनामूला
C. समासोक्ति:I. व्यवहारारोपमूला
D. स्वभावोक्ति:II. सक्रियारूपादिवर्णनमूला

उपरिलिखित में से समुचित विकल्प में (a) सही है।

50. भागवतपुराणाभिमतपुराणलक्षणानां क्रमं चित-

A. वंशानुचरितम्
B. अपाश्रयः
C. वंशः
D. हेतुः
E. संस्था

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत- 

Correct Answer: (c) C. A, E, D, B
Solution:भागवतपुराणाभिमतपुराणलक्षणानां समुचित क्रमः अस्ति ।

C-वंश
A-वंशानुचरितम्
E-संस्था
D हेतु
B-अपाश्रयः

अर्थात् भागवत् पुराण के अनुसार पुराण के दस (10) लक्षण है। जो इस प्रकार है-

1. सर्ग 2. विसर्ग 3. वृत्ति 4. रक्षा 5. अन्तर 6. वंश 7. वंशानुचरित 8. संस्था 9. हेतु 10. अपाश्रय ।