NTA यू.जी.सी. नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर-2024 संस्कृतTotal Questions: 10081. आरोहक्रमेण मण्डलेषु सूक्तानि भवन्ति-A. वरुणसूक्तम् B. पर्जन्यसूक्तम् C. इन्द्रसूक्तम D. उषस्-सूक्तम् E. नासदीयसूक्तम्अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-(a) A, B, D, C, E(b) B, C, D, A, E(c) A, C, D, B, E(d) A, D, C, E, BCorrect Answer: (c) A, C, D, B, ESolution::आरोहक्रमेणमण्डलेषु सूक्तानि भवन्ति-वरुणसूक्त इन्द्रसूक्त उषस् सूक्त पर्जन्यसूक्त नासदीय सूक्त। अर्थात् यह सूक्त वरुण सूक्त ऋग्वेद के प्रथम मण्डल का एक सौ पच्चीसवाँ सूक्त है, जबकि इन्द्र सूक्त द्वितीय मंडल के बाइसवें सूक्त में और उषस् सूक्त तृतीय मण्डल के इकसठवें सूक्त में औरपर्जन्य सूक्त पञ्चममण्डल के तिरासिहवें सूक्त में वर्णन है और नासदीय सूक्त का वर्णन ऋग्वेद के दसम मंडल के एक सौ उनतीसवें सूक्त में वर्णित है। अतः विकल्प (c) सही है।82. अधोलिखितेषु पौर्णमाससंज्ञकाः यागाः भवन्ति-A. अग्निषोमीयः B. उपांशुयाजः C. वाजपेयः D. ऐन्द्रः E. आग्नेयःअधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत- (a) A, B, D केवलम्(b) A, C, D केवलम्(c) A, D, E केवलम्(d) A, B, E केवलम्Correct Answer: (d) A, B, E केवलम्Solution:उपरिलिखितेषु पौर्णमाससंज्ञकाः यागाः अग्निषोमीयः उपांशुयागः आग्नेयः भवन्ति। अर्थात् पौर्णमास याग संज्ञक अग्निषोमीय, उपांशुयाग और आग्नेयः होते हैं।पौर्णमासेष्टि याग है-1. आग्नेय अष्टाकपालक पुरोडाशयाग 2. अग्निषोमीय उपांशु याग 3. अग्निषोमीय एकादशकपालक पुरोडाश याग और दर्शयाग है- 1. इन्द्र प्रीत्यर्थक पुरोडाश याग 2. अग्निप्रीत्यर्थक पुरोडाश याग 3. इन्द्रप्रीत्यर्थक पयोद्रव्यकशाक याग।अतः विकल्प (d) सही है।83. परस्परं समुचितं मेलयत -सूची १सूची २A. द्वेष्टि श्वशूरप जाया रुणद्धिI. इन्द्रसूक्तम्B.राजन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिवम्II. उषस्सूक्तम्C. यं शंसस्तंयः शशमानमूतीIII. अक्षसूक्तम्D. चक्रमिव नव्यस्या ववृत्स्वIV. अग्निसूक्तम्अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत(a) A-I, B-III, C-II, D-IV(b) A-IV, B-I, C-III, D-II(c) A-III, B-IV, C-I, D-II(d) A-II, B-I, C-IV, D-IIICorrect Answer: (c) A-III, B-IV, C-I, D-IISolution:सूची १सूची २A.द्वेष्टि श्वश्रूरप जाया रुणद्धिIII. अक्षसूक्तम्B.राजन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिवम्IV. अग्निसूक्तम्C. यं शंसस्तं यः शशमानमूतीI. इन्द्रसूक्तम्D. चक्रमिव नव्यस्या ववृत्स्वII. उषस्सूक्तम्अतः समुचित विकल्प (c) है।84. अधोलिखितवाक्यांशान् संयोज्य यथोक्तश्लोकं रचयत।A. कृतः कृतार्थोऽस्मि B. विलोकनेनैव तवामुना मुने ! C. निबृंहितांहसा D. गिरोऽथ वा श्रेयसि केन तृप्यते E. तथापि शुश्रूषुरहं गरीयसीः अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत- (a) A, C, B, E, D(b) A, C, D, E, B(c) B, A, E, D, C(d) B, A, C, E, DCorrect Answer: (d) B, A, C, E, DSolution:B. विलोकनेनैव तवामुना मुने! A. कृतः कृतार्थोऽस्मि । C. निबृंहितांहसा । E.तथापि शुश्रूषरहं गरीयसीः । D. गिरोऽथ वा श्रेयसि केन तृप्यतेअर्थात् ये सभी श्लोक 'शिशुपालवधम्' से लिया गया है। यह ग्रन्थ महाकवि माघ द्वारा रचित है। इसमें 20 सर्ग और 1650 श्लोक है।85. योगानियमेषु परिगण्यते-A. सत्यम् B. शौचम् C. तपः D. ईश्वरप्रणिधानम् E. अस्तेयम्अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत- (a) C, D, E केवलम्(b) A, B, C केवलम्(c) B, D, E केवलम्(d) B, C, D केवलम्Correct Answer: (d) B, C, D केवलम्Solution:योगानियमेषु परिगण्यते-शौचम्, तपः ईश्वरप्रणिधानम्। अर्थात् योगाङ्गों के नियम शौच, तप, ईश्वरप्राणिधान है। योगदर्शन के योग अङ्गों के नियम पाँच (5) है। "शौचसन्तोषतपः स्वाध्यायेश्वर प्रणिधानानि नियमाः । " 1. शौच 2. सन्तोष 3. तप 4.स्वाध्याय 5. ईश्वरप्रणिधान।योगदर्शन के प्रणेता पतञ्जलि मुनि है।86. तात्पर्यनिर्णयलिङ्गानां क्रमं चिनुतA. अपूर्वता B. अर्थवादः C. अभ्यासः D. उपपत्तिः E. फलम्अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत- (a) C, A, E, B, D(b) C, B, D, A, E(c) B, C, D, E, A(d) A, B, C, D, ECorrect Answer: (a) C, A, E, B, DSolution:तात्पर्यनिर्णयलिङ्गानां क्रमं-अभ्यासः अपूर्वता, फलम्, अर्थवादः, उपपत्तिः । अर्थात् तात्पर्य निर्णय के लिङ्गों के क्रम अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद और उपपत्ति ।87. मन्वनुसारेण द्विशमुद्दिश्य क्रियमाणभोजनस्य फलसम्बद्धानि सत्यवचनानि चिनुतA. प्राङ्मुखभोजनेन बलवर्धनम्। B. प्रत्यङ्मुखभोजनेन श्रीवर्धनम्। C. उदमुखवचनेन सत्यवर्धनम्। D. दक्षिणामुखभोजनेन यशोवर्धनम्। E. उर्ध्वमुखभोजनेन आयुर्वर्धनम्।अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-(a) A, C, D केवलम्(b) C, D, E केवलम्(c) A, B, C केवलम्(d) B, C, D केवलम्Correct Answer: (d) B, C, D केवलम्Solution:मन्वनुसारेण दिशमुद्दिश्य क्रिमाणभोजनस्य फलसम्बद्धानि प्रत्यङ्मुखभोजनेन श्रीवर्धनम्, उदङ्मुखवचनेन सत्यवर्धनम् । दक्षिणामुखभोजनेन यशोवर्धनम्। इति सत्यवचनानि अस्ति । अर्थात् मनु के अनुसार भोजन के फल से सम्बन्धित कथन पश्चिम ओर मुख करके भोजन करने से लक्ष्मी की वृद्धि होती है।उत्तर की ओर मुख करके भोजन करने से सत्यता बढ़ती है। दक्षिण की ओर मुख करके भोजन करने से यश की वृद्धि होती है। ये सत्य कथन है। "आयुष्यं प्राङ्मुखे भुङ्क्ते यशसं दक्षिणमुखः । श्रियं प्रत्यङ्मुखो भुङ्क्ते ऋतं भुङ्क्ते हृदन्मुखः।"88. श्रीमद्भागवतपुराणस्य टीके वर्तेते-A. गूढार्थदीपिका B. तत्त्वदीपिका C. गूढार्थदृष्टीका D. भावार्थदीपिका E. सारार्थदर्शिनीअधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत- (a) A, B केवलम्(b) C. D केवलम्(c) C, E केवलम्(d) D. E केवलम्Correct Answer: (d) D. E केवलम्Solution:श्रीमद्भागवतपुराणस्य टीके भावार्थदीपिका, सारार्थदर्शिनी वर्तते ।अर्थात् श्रीमद् भागवतपुराण की टीका भावार्थदीपिका, सारार्थदर्शिनी है।भावार्थदीपिका = श्रीधरस्वामी सारार्थदीपिका = विश्वनाथ चक्रवर्ती भागवतचन्द्रचन्द्रिका = राघवाचार्य भागवततत्पर्यनिर्णय = श्री माधवाचार्य सुबोधनी = बल्लभाचार्यअन्य विकल्पगूढार्थदीपिका = श्रीधनपतिसूरि। तत्वदीपिका = उदयचन्द्र जैन ।89. "प्रत्यक्षपोक्षानुमेया हि राजवृत्तिः" इति कस्य वचनम्?(a) भारद्वाजस्य(b) विशालाक्षस्य(c) पाराशराणाम्(d) बार्हस्पत्यानाम्Correct Answer: (a) भारद्वाजस्यSolution:"प्रत्यक्षपोक्षानुमेया हि राजवृत्तिः” इति भारद्वाजस्य वचनम् अस्ति। अर्थात् "राजवृत्ति का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष अनुमान होता है" यह कथन भारद्वाज द्वारा कहा गया है। यह वृत्ति अर्थशास्त्र से है। इसके रचयिता कौटिल्य है।90. समीचीनसम्बन्धं मेलयतसूची १सूची २A. शूद्रकःI. आदिसूरः:B. भट्टनारायणःII. भट्टगोपालःC. विल्हणःIII. नायकचारुदत्तःD. भवभूति:IV. कर्णसुन्दरीअधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत- (a) A-I, B-II, C-IV, D-III(b) A-III, B-II, C-1, D-IV(c) A-III, B-I, C-IV, D-II(d) A-III, B-IV, C-II, D-ICorrect Answer: (c) A-III, B-I, C-IV, D-IISolution:सूची १सूची २A. शूद्रकः – नायकचरितम्III. नायकचारुदत्तःB. भट्टनारायणःI. आदिसूरःC. विल्हणःIV. कर्णसुन्दरीD. भवभूति:II. भट्टगोपालःअतः समुचित सम्बन्ध विकल्प (c) है।Submit Quiz« Previous12345678910Next »