NTA यू.जी.सी. नेट/जेआरएफ परीक्षा, जून-2025 योगा (Yoga)

Total Questions: 100

31. मुण्डकोपनिषद में वर्णित पराविद्या के अनुसार ब्रह्म कैसा है?

A. देश्य
D. अग्राह्य
B. अद्देश्य
C. असर्वगत
E. नित्य

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनें।

Correct Answer: (c) केवल B,D, E
Solution:

मुण्डकोपनिषद में पराविद्या के अनुसार ब्रह्मा अद्देश्य, अग्राह्य और नित्य है।

B. अद्रेश्य इसका अर्थ जिसे देखा नहीं जा सकता, यानी ब्रह्मा इंद्रियों से परे है।

D. अग्राह्य - इसका अर्थ है जिसे पकड़ा नहीं जा सकता, यानि ब्रह्मा भौतिक रूप से ग्रहण करने योग्य नहीं है।

E. नित्य - इसका अर्थ है जो शाश्वत है, जिसका कभी नाश नहीं होता। मुण्डकोपनिषद में ब्रह्मा को 'अद्देश्य' और 'अग्राह्य' कहा गया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह अस्तित्वहीन है बल्कि, यह कहा गया है कि ब्रह्मा इंद्रियों और मन से परे है, और उसे केवल ज्ञान और अनुभव से ही जाना जा सकता है।

32. दो न्यूरॉन के मध्य सन्धिस्थल को कहते हैं।

Correct Answer: (d) साइनेप्स (अन्तर्ग्रथनक)
Solution:दो न्यूरॉन्स के बीच के संधिस्थल को साइनेप्स (अन्तर्ग्रथनक) कहते हैं, साइनेप्स, दो न्यूरॉन्स के बीच का स्थान है, जहाँ एक न्यूरॉन्स से दूसरे न्यूरॉन्स में सूचना का संचार होता है।

33. परानुकम्पी (पैरासिम्पैथेटिक) क्रियाशीलता का परिणाम है।

Correct Answer: (c) जठर रसों के स्त्राव में वृद्धि
Solution:

परानुकम्पी (Parasympathetic) तंत्रिका तंत्र शरीर की 'शांत अवस्था में क्रियाशील होती है। इसका कार्य आराम और पाचन (Rest and digest) से जुड़ा है। परानुकम्पी तंत्रिका तंत्र पाचन क्रिया को उत्तेजित करता है। यह जठर (gastric) रसों को बढ़ाता है और हृदय की गति को धीमा करता है, ऊर्जा की बचत करता है लेकिन ऊर्जा संचय मुख्य प्रभाव नहीं होता।

34. घेरण्ड के अनुसार भुजङ्गासन में अष्ठ से लेकर नाभि पर्यन्त भाग को इस प्रकार करें।

Correct Answer: (b) भूतल पर स्थापित करें।
Solution:

घेरण्ड संहिता के अनुसार भुजंगासन में अङ्गुष्ठ से लेकर नाभि पर्यान्त भाग को भूतल पर स्थापित करें- ऐसा निर्देश दिया गया है।

घेरण्ड संहिता 2.42 में वर्णन है कि -

अष्ठत् नाभिपर्यन्त भूतले स्थापयेद् दृढम्।
उर्ध्वतु वक्ष आदाय भुजङ्गः स्याद् तु वार्जितः ।।

इस श्लोक का अर्थ है कि अष्ठ (पैरों की अंगुलियों) से लेकर नाभि तक के भाग को जमीन पर दृढ़ता से रखना चाहिए और ऊपर के भाग (वक्षस्थल आदि) को उठाना चाहिए तब यह भुजंग आसन कहलाता है।

35. अथर्ववेद की पिप्पलाद शाखा से सम्बद्ध उपनिषद है।

Correct Answer: (c) प्रश्नोपनिषद
Solution:अथर्ववेद की पिप्पलाद शाखा से सम्बद्ध उपनिषद प्रश्नोपनिषद है। यह उपनिषद ऋषि पिप्पलाद और उनके छः शिष्यों के बीच प्रश्न और उत्तर के रूप में है इसलिए इसका नाम प्रश्नोपनिषद है।

36. घेरण्ड संहिता के अनुसार नाभि को कितने बार मेरूपृष्ठ के साथ संयुक्त करने को अग्निसार धौति कहते हैं?

Correct Answer: (b) 100
Solution:घेरण्ड संहिता का श्लोक प्रमाण (अध्याय 1, श्लोक 17) :

''नाभि मेरूपृष्ठसंस्था कृत्वा शतवारकम्।
अग्निसारी भवेदेष धौतिः पापप्रणाशिनी ।।"

• अर्थात् "नाभि मेरूपृष्ठसंस्था कृत्वा"- नाभि को मेरुदण्ड (रीढ़) की ओर खींचना
• "शतवारकम्” 100 बार यह क्रिया करना '
• अग्निसारी भवेदेष" - यही क्रिया अग्निसार धौति कहलाती है।
• 'पापप्रणाशिनी" यह पापों को नष्ट करने वाली, अर्थात् शरीर को शुद्ध करने वाली क्रिया है।

37. घेरण्ड संहिता के श्लोकानुसार क्रमबद्ध करें।

A. प्याज़
B. जम्बीर
C. कुलथी की दाल
D. कपित्थ
E. दधि

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनें।

Correct Answer: (b) E, C, D, B, A
Solution:घेरण्ड संहिता के श्लोकानुसार क्रमबद्ध है-

E. दधि
C. कुलथी की दाल
D. कपित्थ
B. जम्बीर
A. प्याज

38. नादबिन्दूपनिषद के अनुसार ओंकार की प्रथम पाँच मात्राओं को क्रमबद्ध कीजिए।

A. नामधेया
B. पातङ्गिनी
C. घोषिणी
D.विद्युन्मात्रा
E. वायुवेगिनी

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनें।

Correct Answer: (a) C, D, B, E, A
Solution:नादविन्दूपनिषद के अनुसार ओंकार की प्रथम पाँच मात्राओं को क्रमबद्ध किया गया है-

C. घोषिणी
D.विद्युन्मात्रा
B. पातङ्गिनी
E. वायुवेगिनी
A. नामधेया

39. पातंजल-योगसूत्र में शरीर की निम्न काय-सम्पदाएँ हैं।

Correct Answer: (b) वज्र के समान संगठन, रूप, लावण्य, बल
Solution:

पतंजलि योग सूत्र में काय सम्पदा (शरीर की विशेषत्व सिद्धियाँ) का वर्णन योगसूत्र 3.46 में मिलता है।

"रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसंपत।।46 ।।

इसका अर्थ है : योग के अभ्यास से शरीर में जो विशेषताएँ आती हैं वे हैं-

• रूप (सुन्दरता) लावण्य (आकर्षण)
• बल शक्ति
• वज्र संहननत्व (वज्र के समान संगठन या काया)

40. किस चक्र के नियमन से भावनाओं को नियन्त्रित किया जाता है?

Correct Answer: (d) अनाहत चक्र
Solution:

अनाहत चक्र भावनाओं को नियंत्रण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह चक्र हृदय के पास स्थित होता है और इसे हृदय चक्र भी कहा जाता है। अनाहत चक्र प्रेम, करुणा, सहानुभूति, क्षमा और आशा जैसी भावनाओं का केन्द्र है।