Solution:अरबिन्दो घोष ने एक दैवीय शरीर में एक दैवीय जीवन में मानव जीवन के उद्विकास की कल्पना की थी।
अरबिन्दो घोष ने माना है कि, राष्ट्र, एक शरीर की तरह है। यह एक आंगिक जीवन एवं एक आस्तिक प्रवृत्ति है, जिसमें मन एवं शरीर का विकास होता है। राष्ट्र, केवल भू-भाग का टुकड़ा नहीं बल्कि यह माँ है।