महाभारत में कहा गया है- "मुहूर्त ज्वलितं श्रेयः, न तु धूमायितं चिरम्।" जीवन के लिये श्रेयस्कर है एक मुहूर्त में भभक कर जल उठना, बहुत समय तक धुआँना ठीक नहीं है। सच्चा जीवन वही है जो जीवन भर दीपक की तरह जलता रहे किन्तु आज सम्पूर्ण विश्व चौबीसों घण्टे धुआँ सा नजर आ रहा है। इस धुआँती जिन्दगी ने खुद की आँखें भी आँसुओं से भरी हैं और दूसरों की भी। सच तो यह है कि अगर धुआँ न हो तो अन्धेरा भी बेहतर था।
चले थे रोशनी की तलाश में, अंधेरे को भी विक्षिप्त कर दिया। जीवन को धुआँ धुआँसा कर दिया। समस्त समाज आज गीली लकड़ी की तरह बनकर रह गया है। जलाओ तो सिर्फ धुआँ ही उठता है। जितना गीलापन, उतना धुआँ ।
धुआँ कोई अग्नि का रूप नहीं है। मूल शिक्षा का सार तत्व यही है कि वह समाज को सूखी लकड़ी में परिणित कर दे। उससे अविवेक, हिंसा, बेईमानी की आर्द्रता सोख ले। ताकि लकड़ी अग्नि प्रज्वलन का आधार बन सके।
आग हमेशा ऊपर ही उठती है। पानी हमेशा नीचे ही बहता है। चाहे मशाल को औंधी कर दें, अग्नि ऊपर ही उठेगी। चाहे दरिया को ऊपर ही उठा दें, पानी नीचे ही बहेगा। पानी लकड़ी की आर्द्रता है। अग्नि लकड़ी का आत्मतत्व है। तभी सूखी लकड़ियों की रगड़ से अग्नि का उद्घाटन होता है।
शिक्षा का कार्य आत्मतत्व की अग्नि का उद्घाटन मात्र है ताकि व्यक्ति 'सम्यक् ऊर्ध्व गति कर सके। ऊर्ध्व जिसकी गति के लिए अनंत आकाश है। लेकिन हम ऊर्ध्व तो दूर क्षैतिज विकास भी नहीं कर पाए। उल्टे हमने अधोगामी विकास जरूर कर लिया। पानी की गति-सा। पाताल की ओर । विकास के लबादे में बैठा विनाश ।
शान्ति के कपड़ों में छुपी अशांति । निश्चित ही हमारी शिक्षा को शांति के लिए- 'मुहूर्त ज्वलित श्रेयः की ओर बढ़ना चाहिए।
'पानी की गति-सा' पदबंध विकास की किस प्रकृति को इंगित करता है?