भारत में परंपरा के प्रयोजन और औचित्य को लेकर दो अतिरेकवादी और परस्पर घोर विरोधी स्वर अकसर सुनाई पड़ते हैं। एक स्तर पर वो परंपरा प्रेमी हैं जो अतीत के प्रत्येक चिह्न को परंपरा मानने की जिद पकड़े हैं और दूसरे स्तर पर वो 'आधुनिक' हैं जो देश के प्रत्येक प्राचीन को संदेह की दृष्टि से देखते हैं और एक कथित आधुनिक राष्ट्र के निर्माण में उसे बाधा की तरह पाते हैं।
भारतीय मनीषा ने परंपरा को महत्व तो सदैव दिया है, परन्तु इसे उचित ही प्रश्नांकित और तदनुसार परिमार्जित भी किया है। भारतीय समाज को एक परंपरावादी समाज के रूप में अभिहित किया जाता है जिससे कुछ लोग यह धोखा खा जाते हैं कि प्राचीनतम समय से यहाँ कुछ नहीं बदला है। परंपरा के साथ परिवर्तन ही भारतीय समाज की खूबी है। वैदिक संहिताओं की कतिपय मान्यताओं का विरोध उपनिषदों में ही हो गया जो कि वैदिक वाङ्मय के ही भाग थे।
महावीर स्वामी व गौतम बुद्ध ने उस वर्ण व्यवस्था का विरोध किया जिसमें वे स्वयं जन्मे थे। बौद्ध धर्म की नितान्त नीरस हीनयान परंपरा का विरोध महायान संप्रदाय के रूप में सामने आया और महायान संप्रदाय के सृष्टिविषयक परिकल्पना का यह दार्शनिक वितान रचा जिसका गौतम बुद्ध सदैव विरोध करते रहे थे।
जब पारसिकों एवं शकों से संपर्क हुआ तो उनका क्षत्रप-महाक्षत्रप का ढांचा भारत की राजनीतिक प्रणाली का हिस्सा बन गया। गांधार कला का शिल्प शास्त्र हम भारतीयों को यूनानियों से लेने में कोई संकोच नहीं हुआ।
इसी प्रकार ज्योतिष में यवन सिद्धांत को आदर के साथ स्थान मिला। अचकन और बूट मध्य एशिया के ठंडे प्रदेशों से आये कुषाण लाये थे। भारतीय वस्त्र विन्यास में ये इस प्रकार समाहित हो गए कि इन्हें पृथक् परंपरा के रूप में देखना संभव नहीं।
यह बदलाव ही भारतीय परंपरा की पूँजी है। जब कभी बदलाव को छोड़कर वह जड़ता की ओर उन्मुख हुई है, उसने दीर्घकालीन प्रगति को नुकसान ही पहुँचाया है। सामाजिक इतिहासकारों के अनुसार गुप्तोत्तर काल एक ऐसा युग था जब परंपराओं के पिष्टपेषण का बोलबाला था। परिवर्तन और परिमार्जन की कोई प्रेरणा नहीं थी।
उस समय परंपरा के नाम पर कुछ ऐसी बद्धमूल धारणाएँ विकसित हुईं जिनका दुष्परिणाम हम आज भी भोग रहे हैं।
यद्यपि यह सही है कि अतीत की कुछ बद्धमूल परंपराओं का खामियाजा हमें उठाना पड़ा परंतु यह अभीष्ट नहीं है कि संपूर्ण अतीत और तजनित परंपरा सर्वथा त्याज्य हो जाए। स्वातंत्र्योत्तर भारत में आधुनिकता एवं बौद्धिकता के नाम पर समृद्ध अतीत को कटघरे में खड़ा करना एक बौद्धिक विलास बन गया है।
हर वह चिह्न और धरोहर जो प्राचीन व परंपरा से जुड़ी हुई है बौद्धिक समाज के एक वर्ग के लिये हेय बन गई है। परंपरा को प्रश्नांकित और तदनुसार परिमार्जित करना तो आवश्यक है परंतु उसकी पूर्व शर्त यह है कि परंपरा का ठीक से अवगाहन किया जाए।
भारतीय समाज की विशेषता है